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सुप्रीम फैसलाः क्या हैं ग्रीन पटाखे और रेड पटाखे, दिवाली पर दो घंटे जलाने की मिली है छूट

Wed, 24 Oct 2018 10:17 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पर पटाखे जलाने की अनुमति दे दी है, लेकिन पर्यावरण को देखते हुए कुछ बंदिशें भी लगा दी हैं। पटाखा कारोबारियों ने पहले ही पटाखे तैयार कर लिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कम आवाज और कम प्रदूषण फैलाने वाले पटाखे जलाने की ही अनुमति दी है, जिनमें केमिकल की मात्रा भी न के बराबर ही होगी।

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सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण के खराब होते हालात को देखते हुए दिवाली पर पटाखे जलाने का लोगों को तोहफा दे दिया है। हालांकि लोगों के लिए ऐसे पटाखे ढूंढना काफी मुश्किल होगा। क्योंकि ऐसे पटाखे बहुत ज्यादा मात्रा में नहीं बन रहे हैं। अधिकतर दुकानदारों को इस बारे में पता भी नहीं होता।

ग्रीन पटाखों से प्रदूषण में आती है 35% की कमी
सीएसआईआर के ग्रीन पटाखों के जरिए खतरनाक सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड के साथ ही छोटे-छोटे कणों के उत्सर्जन में करीब 35 फीसदी की कमी की जा सकती है। लेकिन अभी ये कहना काफी मुश्किल है कि ये पटाखे लोगों को दिवाली से पहले मिल पाएंगे या नहीं।

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क्या हैं ग्रीन पटाखे और क्यों नहीं हैं संभव

- फोटो : अमर उजाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में पर्यावरण के अनुकूल पटाखों का जिक्र किया है। जिसे ईको फ्रेंडली या ग्रीन पटाखे नाम दिया गया है। केंद्रीय विज्ञान एवं पर्यावरण मंत्री हर्षवर्धन ने विज्ञान एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) को इनकी तकनीक बनाने का निर्देश दिया था।

पटाखों में कागज का इस्तेमाल जहरीला धुआं पैदा करता है वहीं इनमें इस्तेमाल बेरियम और स्ट्रांटियम जैसी धातु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं। प्रदूषण फैलाने वाले रसायन परचोरेलेट की जगह नाइट्रोसेलुलोज का इस्तेमाल भी बेहतर रहेगा। कोर्ट का कहना है कि ग्रीन पटाखों का मतलब कम धुएं, कम आवाज और घातक रसायनों के न होने से है। 

संभव नहीं हैं ग्रीन पटाखे
पटाखों के निर्माण के बड़े केंद्र तमिलनाडु के शिवकाशी में पटाखा निर्माताओं की संस्था का कहना है कि वे सुप्रीम कोर्ट के केवल ग्रीन पटाखों की अनुमति के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे। तमिलनाडु फायरवर्क्स एसोसिएशन का कहना है कि ग्रीन पटाखों जैसा कुछ नहीं होता। संस्था ने कहा कि हम पटाखों में रसायन का इस्तेमाल कम कर सकते हैं पर ग्रीन पटाखे कैसे बनेंगे इस बारे में हमें कुछ भी पता नहीं है।

कौन सा पटाखा हवा में घोलता है कितना पीएम 2.5
सांप वाला पटाखा- यह 3 मिनट के अंदर 64,849 यूजी/क्यूबिक मीटर पीएम 2.5 छोड़ता है।
चटाई बम(1000 लड़ी वाली)- 6 मिनट के अंदर 47, 789  यूजी/क्यूबिक मीटर पीएम 2.5 छोड़ता है।
पुलपुल- ये 3 मिनट में 34,068   यूजी/क्यूबिक मीटर पीएम 2.5 छोड़ता है।
फुलझड़ी- 2 मिनट में 10,898  यूजी/क्यूबिक मीटर पीएम 2.5 छोड़ता है।
चकरी- 5 मिनट में 10,475  यूजी/क्यूबिक मीटर पीएम 2.5 छोड़ता है।
अनार बम- 3 मिनट में 5,640  यूजी/क्यूबिक मीटर पीएम 2.5 छोड़ता है।
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कितना खतरनाक है पटाखा जलाना, इनमें होने वाले रंगों का क्या है मतलब

भारत विश्व में पटाखा उत्पादन करने वाला चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा देश है। यहां हर साल बड़ी मात्रा में पटाखों की खपत भी होती है। हम बहुत उत्साह से अपने त्योहारों और शादियों के दौरान पटाखे जलाते हैं लेकिन हम में से बहुत कम लोगों को पता है कि पटाखे वाकई में कितने खतरनाक होते हैं। पटाखों में कई तरह के केमिकल का इस्तेमाल किया जाता जिनमें हर केमिकल के नुकसान अलग-अलग होते हैं।

सल्फर डाइऑक्साइड, स्ट्रोंटियम+लिथियम(लाल रंग): यह केमिकल सबसे ज्यादा फेफड़े और सांस की बीमारियों से ग्रसित रोगियों के लिए नुकसानदेह है।

कैडमियमः कैडमियम की ज्यादा मात्रा मानव शरीर में जाने पर यह किडनी और लीवर को नुकसान पहुंचाता है। नर्वस सिस्टम को भी हानि पहुंचाता है।

कॉपर (नीला): पटाखों में मिलाया जाने वाला कॉपर श्वसन तंत्रिका के लिए नुकसानदेह है।

नाइट्रेटः त्वचा के साथ ही आंखों में जलन पैदा करता है। बच्चों के लिए हानिकारक है।

लेडः यह यंत्रिका तंत्र के लिए बहुत बुरा है।

बेरियम (ग्रीन): जहरीला धुआं श्वसन तंत्र को पहुंचा सकता है नुकसान।

कौन सी बीमारियों के शिकार हो सकते हैं
अस्थमा का अटैक
छोटे बच्चों के दिमाग विकसित होने में आ सकती है परेशानी
निमोनिया के मामलों में बढ़ोतरी
फेफड़े से संबंधित बीमारी का खतरा
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