झा ने याचिका में यह जानने की मांग की है कि क्या ‘आजीवन कारावास’ की विशिष्टता का मतलब पूरे जीवन के लिए होगा। या फिर क्या इसे आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 432 की शक्तियों से कम या माफ किया जा सकता है। सीआरपीसी की धारा 432 सजा निलंबित करने या कम करने की शक्ति से जुड़ी है।
सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रीय राजधानी में 2006-07 में हत्या कर तिहाड़ जेल के बाहर सिर कटी लाशें रखने के दोषी चंद्रकांत झा की याचिका पर सुनवाई को तैयार हो गया। झा ने याचिका में यह जानने की मांग की है कि क्या ‘आजीवन कारावास’ की विशिष्टता का मतलब पूरे जीवन के लिए होगा। या फिर क्या इसे आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 432 की शक्तियों से कम या माफ किया जा सकता है। सीआरपीसी की धारा 432 सजा निलंबित करने या कम करने की शक्ति से जुड़ी है।
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जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने झा की याचिका पर दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। झा को तीन हत्याओं का दोषी ठहाराया गया था। वकील ऋषि मल्होत्रा के जरिये दायर याचिका में झा ने कहा कि उसे धारा 302 (हत्या) और 201 (अपराध के सबूतों को गायब करना) के तहत दोषी ठहराया गया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने उसे निचली अदालत से मिली मौत की सजा को कम कर इसे आजीवन कारावास में बदल दिया था।
लेकिन इसमें शर्त थी कि आजीवन कारावास की सजा का मतलब याचिकाकर्ता के जीवन की पूरी अवधि होगी। याचिका में कहा गया कि यहां यह उल्लेख जरूरी है कि आईपीसी की धारा 302 में स्पष्ट रूप से दो दंडों का उल्लेख है। एक है मौत की सजा और दूसरा है आजीवन कारावास। इन दोनों के अलावा इसमें किसी अन्य सजा का जिक्र नहीं है। इसमें कहा गया कि विधायिका ने जानबूझकर आईपीसी की धारा 302 में संशोधन करने और सिर्फ जीवन के बजाय प्राकृतिक जीवन को जोड़ने का इरादा नहीं किया है।
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इसलिए, कानून इस बात पर विचार नहीं करता है कि जीवन का मतलब सिर्फ प्राकृतिक है। पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए इसे इसी तरह का मुद्दा उठाने वाली एक अलग याचिका के साथ टैग कर दिया।