केंद्र सरकार को यूनिटेक लिमिटेड का अधिग्रहण करने के नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्युनल (एनसीएलटी) के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। वहीं सरकार ने अपनी गलती मानते हुए कहा कि उसे ट्रिब्युनल के पास जाना चाहिए था।
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष बुधवार को अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने माफी मांगते हुए कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
ऐसे में सरकार को एनसीएलटी में नहीं जाना चाहिए था। पीठ ने अटॉर्नी जनरल के बयान को रिकार्ड पर लेते हुए एनसीएलटी के 8 दिसंबर के आदेश पर रोक लगा दी। मामले की अगली सुनवाई 12 जनवरी को होगी।
ट्रिब्युनल ने 8 दिसंबर को कॉरपोरेट मामले के मंत्रालय को यूनिटेक का प्रबंधन हाथ में लेने का आदेश दिया था। साथ ही कंपनी के आठ निदेशकों को निलंबित करने का आदेश देते हुए मंत्रालय को 10 निदेशकों को नियुक्त करने का आदेश दिया था।
गौरतलब है कि 30 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने यूनिटेक को 31 दिसंबर तक 750 करोड़ रुपये जमा कराने का निर्देश दिया था। उस दिन अदालत ने यह भी साफ किया था कि यह रकम जमा होने के बाद ही जेल में बंद यूनिटेक के प्रबंधक निदेशक संजय चंद्रा को जमानत देने पर विचार किया जाएगा।
इस फैसले का ये होगा असर
एनसीएलटी के आदेश पर रोक का असर यह होगा कि जेल में बंद यूनिटेक के प्रबंध निदेशक संजय चंद्रा कंपनी की संपत्तियों को बेचने के लिए बातचीत कर सकेंगे। इससे वह सुप्रीम कोर्ट के 750 करोड़ रुपये जमा कराने के आदेश का पालन कर सकेंगे।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी के मुखिया को ये पैसे कोर्ट की रजिस्ट्री में इस माह के अंत तक जमा कराने को कहा था ताकि परेशान खरीदारों को पैसा लौटाया जा सके।
पीठ ने की अटॉर्नी जनरल की तारीफ
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल की तारीफ की। पीठ ने कहा कि उन्होंने अदालत के प्रति उचित व्यवहार किया है साथ ही उनके रुख से पीठ और खरीदारों के ‘भारी तनाव’ और ‘समय’ का बचत हुआ है।