तिहाड़ को दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी और सुरक्षित जेलों में से एक माना जाता है। पिछले कुछ दिनों से यह जेल लगातार विवादों में है।
यहां लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिनमें जेल प्रशासन की संवेदनहीनता उजागर हो रही है। पहला मामला जेल के अंदर कैदियों की देखभाल का है जबकि, दूसरा मामला कैदियों की रिहाई से जुड़ा हुआ है।
पिछले दो दिनों में यहां दो कैदियों की मौत हो चुकी है। पत्नी की हत्या के मामले में जेल नंबर तीन के ड्रग एडिक्ट वार्ड में बंद अमोलकर (40) मंगलवार को टॉयलेट में फांसी लगाकर जान दे दी। चौंकाने वाली बात है कि यह व्यक्ति डिप्रेशन में होने के कारण विशेष निगरानी में था।
उसने जेल में मिले चादर से टॉयलेट में लगी खिड़की की ग्रिल के सहारे फांसी लगा ली। इससे पहले भी उसने आर्गेनिक फॉस्फोरस पीकर जान देने की कोशिश की थी।
सुइसाइड की घटना से एक बार फिर जेल में सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। इससे पहले वसंत विहार गैंगरेप के मुख्य आरोपी राम सिंह ने तिहाड़ जेल में ही 11 मार्च 2013 को फांसी लगाकर जान दे दी थी।
बेल के भी बाद भी मिली जेल
दूसरी घटना जेल नंबर चार की है। जेल अधिकारियों के मुताबिक यहां टॉयलेट में गिरने से कैदी विनोद (26) गंभीर रूप से घायल हो गया था। जेल में प्राथमिक उपचार के बाद उसे दीन दयाल अस्पताल ले जाया गया, जहां बुधवार को उसकी मौत हो गई।
मामला आत्महत्या तक ही सीमित नहीं है। कहने को जेल को सुधार गृह कहा जाता है। उम्मीद की जाती है कि यहां से निकलने के बाद अपराधी एक सामान्य जीवन जीने के लिए तैयार होता है।
वैसे भी यहां अदालतों की प्रकिया लंबी चलती है। ऐसे में अगर किसी कैदी को बेल मिलने के बाद भी जेल में ही रहने के लिए मजबूर होना पड़े तो यह बेहद शर्मनाक है।
ऐसा किसी पिछड़े गांव या छोटे शहर की जिला अदालत में नहीं बल्कि देश की राजधानी तिहाड़ में हो रहा है। दिल्ली हाई कोर्ट ने खुद ही इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए जेल से पूछा कि बेल मिलने के बाद भी कैदियों की रिहाई क्यों नहीं की जा रही है।
57 कैदियों के साथ अन्याय का खुलास
तिहाड़ में चल रही इस लापरवाही का खुलासा उस रिपोर्ट में हुआ जिसमें स्पेशल सीबीआई जज एल के गौण ने लिखा कि तिहाड़ में ऐसे 57 कैदी हैं जिन्हें बेल और पेरोल मिलने के बाद भी रिहा करने में देरी की जा रही है।
इस रिपोर्ट के बाद चीफ जस्टिस जी आर रोहिणी और आर एस एंडलो ने दिल्ली सरकार और डायरेक्टेड काउंसिल जूबेदा बेगम को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है।
रिपोर्ट के अनुसार तिहाड़ में बेल और पेरोल मिलने के बाद भी वेरिफिकेशन के नाम पर कैदियों को जेल में रखा जाता है। पत्र में गौर ले उन 57 कैदियों की जानकारी दी है जिनके वेरिफि़केशन में 3 से 64 दिन का समय लगा।
जस्टिस गौर ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया कि वेरिफिकेशन की यह प्रक्रिया डीजी जेल की निगरानी में की जानी चाहिए और इस मामले में एक एजेंसी का भी गठन किया जाना चाहिए।