शहर में डीजल वाहनों की संख्या सबसे ज्यादा है। 10 साल पुराने वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं जिन पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। उधर फैक्ट्री व कंपनी में बिजली की कटौती की वजह से लोग जनरेटर का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें डीजल की खपत होती है। इससे निकलने वाला धुआं भी प्रदूषण स्तर को बढ़ावा देता है। लोगों को खुद पहल कर इन पर रोक लगानी चाहिए।
जुगाड़ वाहनों पर सख्ती
एनसीआर की सड़कों पर जुगाड़ वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है। पूरे शहर में ये धड़ल्ले से घूमते नजर आते हैं। तिपहिया ठेेला रिक्शे में स्कूटर का इंजन लगाकर दौड़ाया जा रहा है। इससे निकलने वाला धुआं शहर को प्रदूषित करता है। इसके साथ ही इससे निकलने वाली आवाज से ध्वनि प्रदूषण हो रहा है। इन पर रोक लगाना जरूरी है। अहम है कि ऐसे किसी वाहनों का रजिस्ट्रेशन भी नहीं होता।
सड़कों से उड़ रही धूल
दिल्ली-एनसीआर में खराब सड़कों पर दौड़ते वाहनों से खूब धूल उड़ती है। ये धूल कण लोगों लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं। सांस लेने पर यह धूल के कण हमारे अंदर प्रवेश कर रहे हैं जिससे बीमारी हो रही है या बढ़ रही है। ऐसे क्षेत्रों की पहचान कर सड़क मरम्मत कराना और तब तक वहां नियमित जल छिड़काव से धूल के स्तर को कम किया जा सकता है। प्रदूषण में धूल का योगदान 18 प्रतिशत है। सड़क की धूल से 3 प्रतिशत प्रदूषण होता है।
निर्माण कार्यों से बहुत प्रदूषण होता है। हालांकि 1 नवंबर से इन पर रोक लगाई गई है। निर्माण कार्य से प्रदूषण 1 प्रतिशत से होता है। वहीं अन्य वजहों से 13 प्रतिशत होता है। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि पिछले 15 दिन से प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में इन साइट्स पर पहले रोक क्यों नहीं लगाई गई। हालांकि जब दोबारा काम शुरू हो जाएगा तब वहां धूल कम करने के नियमों को सख्ती से पालन करना सुनिश्चित करना होगा।
कूड़ा जलाने पर रोक
शहरों में जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे होते हैं। कूड़ा इकट्ठा होने पर इसे जलाया जा रहा है जिससे प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। प्राधिकरण की ओर से कई बार निरीक्षण कर दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की गई है। इसके बाद भी लोगों पर कोई असर नहीं दिखता। वे अपने साथ-साथ दूसरे की जिंदगी से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। लोग कूड़ा न जलाएं तो प्रदूषण का स्तर कम हो सकता है।
पराली से होता है सिर्फ इतना प्रतिशत प्रदूषण
आपको जानकर आश्चर्य होगा जिस पराली को प्रदूषण की बड़ी वजह माना और बताया जाता है उससे फैलने वाले प्रदूषण का योगदान महज 4 प्रतिशत है। पिछले 15 से 20 दिनों में भले ही पराली से होने वाले प्रदूषण का प्रतिशत 30 प्रतिशत हो जाता है लेकिन पूरी सर्दी के मौसम में इसका योगदान मामूली होता है।
बाहरी देशों से आने वाली हवाएं
कई बार बाहरी देशों जैसे अफगानिस्तान आदि से भारत की ओर चलने वाली हवाएं भी दिल्ली में प्रदूषण को बढ़ाने का कारण बनती हैं। पिछली सर्दियों में ये हवाएं भी दिल्ली को गैस चेंबर बनाने में कारक रही थीं।