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महामारी और मजबूरीः मां की दवा और स्कूल फीस के लिए कोरोना मरीजों के शव उठा रहा छात्र

Thu, 18 Jun 2020 06:31 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली  
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चांद को टिफिन देकर काम पर भेजती उसकी मां... - फोटो : अमर उजाला
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कोरोना लॉकडाउन से पहले 12वीं के छात्र चांद मोहम्मद की जिंदगी में सब ठीक चल रहा था और वह डॉक्टर बनना चाहता था। लॉकडाउन में बड़े भाई की नौकरी छूटने के बाद अब हालात ऐसे हैं कि वह मां की दवा और भाई-बहनों के स्कूल की फीस के लिए एलएनजेपी अस्पताल में कोरोना से मरने वालों के शव उठा रहा है। उसकी मां को थायरॉयड की बीमारी है लेकिन परिवार के पास इलाज के पैसे नहीं हैं। 

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सीलमपुर निवासी चांद मोहम्मद (20) का बड़ा भाई पहले कृष्णा नगर बाजार में किसी दुकान पर काम करता था तो परिवार चल रहा था। उसकी नौकरी छूटने के बाद परिवार का गुजारा पड़ोसियों से मिले राशन और छोटे मोटे काम धंधे से चल रहा था।

इन हालात में उसने एक सप्ताह पहले एक कंपनी में नौकरी पकड़ी और उसे एलएनजेपी अस्पताल में सफाई के काम पर लगाया गया। अब वह दोपहर 12 बजे से रात आठ बजे तक कोरोना से मरने वालों के शव उठाता है। 
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उसने बताया कि जब कोई कम नहीं मिला तो उसने यह काम किया। इस काम में कोरोना संक्रमण होने का खतरा बेहद ज्यादा है लेकिन उसे नौकरी की जरूरत थी। उसने बताया कि परिवार में तीन बहने और दो भाई और माता पिता हैं। इस समय हमें खाना और मां की दवाएं चाहिए।

लॉकडाउन में कई दिन ऐसे भी रहे जब घर में केवल एक समय खाना बनता था। हम शायद संक्रमण से तो बच जाएं लेकिन भूख से नहीं बच पाएंगे। वह सस्ते कर्ज के लिए कई लोगों से मिला लेकिन किसी ने मदद नहीं की। 

चांद बताया कि उसकी तीन बहने स्कूल में हैं। वह खुद भी अपनी 12 वीं में है और स्कूल की फीस नहीं दे पाया है। पढ़ाई के लिए पैसे चाहिए। उसे उम्मीद है कि उसका पहला वेतन मिलने के बाद हालात में कुछ सुधार आएगा। वह कहता है कि काम पर निकलने से पहले वह नमाज पढ़ता है और उसे खुदा पर भरोसा है।

वह उसकी रक्षा करेगा और रास्ता दिखाएगा। उसे केवल चिंता इस बात की है कि ऐसा खतरनाक काम करने वालों के लिए कोई बीमा पॉलिसी नहीं है। इस खतरनाक काम के लिए उसे 17 हजार रुपये मिलेंगे। 

वह रोजाना दूसरे सफाई कर्मियों के साथ दो-तीन शव उठाता है। उन शवों को एंबुलेंस में रखवाता है और श्मशान लेकर जाता है। वहां एक स्ट्रेचर पर रखकर श्मशान में पहुंचवाता है। यह सब उसे पीपीई किट पहनकर करना होता है जिससे चलने तथा सांस लेने में दिक्कत होती है। पीपीई पहने हुए वह पसीने से नहा जाता है।

मंगलवार शाम उसने एक शव अकेले ही उठाया। उसे कोई मदद नहीं मिली तो उसे इसमें काफी समय लगा और उसकी सांस फूल गई। यह शव करीब एक माह पुराना था और कोई उसे लेने नहीं आया था। अब चांद के परिवार को उसकी सुरक्षा की चिंता है। परिजन रोजाना उसके काम के बारे में पूछते हैं। मां जब रोती है तो वह उसे समझाता है।

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