नाम बदलकर दफ्तर चला रहे थे आरोपी
तीनों फरार आरोपियों की पहचान नीरज त्रिपाठी, दीपक और गुप्ता के रूप में हुई है। गुप्ता का पूरा नाम पता नहीं चला पाय है। पकड़ गए आरोपियों ने बताया कि उनका मास्टरमाइंड गुप्ता ही था। वहीं सभी आरोपियों ने अलग नाम से फर्जी आधार कार्ड बना रखे थे।
आरोपी आशीष ने अपना नाम कुलदीप पता औरैया और सुधीर ने अपना नाम देवेश रखा हुआ था। आरोपियों ने बताया कि उनका (सीनियर) मास्टर माइंड ‘गुप्ता’ है लेकिन इसका पूरा नाम पता वह भी नहीं जानते। आरोपियों ने गुप्ता के कहने पर ही छात्रों की सूची व सिम कार्ड उपलब्ध कराने की बात कही है।
हर एंगल से की जा रही है जांच
एसटीएफ ने सभी आरोपियों की ठगी का शिकार हुए पीड़ितों का व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर केस में पुख्ता सबूत जुटाने की बात कही है। वहीं, इस गोरखधंधे में किसी अन्य (कॉलेज या किसी अन्रू अधिकारी आदि) की भूमिका तो नहीं। इसकी भी जांच की जा रही है।
छात्रों को फंसाने के लिए खोला था ‘कॉल सेंटर’
आरोपियों ने गाजियाबाद में दफ्तर खोलकर चार-पांच युवतियों को नौकरी पर रखा था। इन लड़कियों को नीट में सफलता प्राप्त कर चुके छात्रों व उनके अभिभावकों के नंबर दिए गए थे। दफ्तर में कॉल सेंटर की तरह काम करने वाली इन युवतियों पर छात्रों व अभिभावकों से संपर्क कर एमबीबीएस में प्रवेश के नाम पर झांसा देने का जिम्मा था। जून के पहले सप्ताह में नीट का रिजल्ट आया था। पहली कट ऑफ जारी होने के बाद दाखिले न ले पाने वाले छात्रों से संपर्क साधना शुरू कर दिया गया था।
हर सीट के लिए मांगते थे 30 लाख तक
नीट पास छात्रों और अभिभावकों को 30 लाख खर्च करने पर झांसी के राजकीय मेडिकल कॉलेज में दाखिले की बात कही जाती थी। हालांकि बारगेनिंग कर 15 से 30 लाख के बीच सौदा तय कर उनसे दो लाख एडवांस मांगे जाते। कई बार 50 हजार रुपये तक एडवांस पर भी बात तय हो जाती थी। इसके बाद आरोपी झांसी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए बुलाते और उनके रुकने आदि की व्यवस्था होटल में करते थे।
प्रवेश की राह देख रहे छात्र और अभिभावकों से साधते थे संपर्क
जानकारों के मुताबिक नीट पास करने के बाद बेहतर अंक हासिल करने वालों को शुरुआती कट ऑफ के बाद सरकारी कॉलेजों में प्रवेश मिलता है। अन्य छात्रों को निजी कॉलेजों में दाखिला लेना पड़ता है। जहां एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए 65 से 85 लाख रुपये तक खर्च करने होते हैं। जबकि सरकारी मेडिकल कॉलेजों इससे काफी कम खर्च होता है। गिरोह दाखिले के लिए इंतजार कर रहे ऐसे ही छात्राें और अभिभावकों को सरकारी कॉलेज में दाखिले का भरोसा दिलाकर ठगी करता था।
मेडिकल कॉलेज से अभी तक नहीं मिला कोई लिंक
अभी तक आरोपियों का राजकीय मेडिकल कॉलेज झांसी से कोई लिंक नहीं मिला है। हालांकि आरोपी छात्रों और अभिभावकों वहीं बुलाकर फॉर्म और डीजी हेल्थ के नाम से ड्राफ्ट बनवाते थे। एसटीएफ के मुताबिक ये प्रक्रिया केवल पीड़ितों को भरोसा दिलाने व झांसा देकर ठगी लिए थी। वास्तविकता में ये फार्म या ड्राफ्ट को कहीं भी जमा नहीं कराना था और न ही कोई प्रवेश दिलाना था। सूत्रों का यह भी कहना है कि एसटीएफ के एक अधिकारी को भी किसी ने कॉल कर बेटी का प्रवेश कराने का झांसा दिया था लेकिन अधिक पूछताछ करने पर कॉल काट दी गई।
गिरोह के जाल में फंसे ज्यादातर हाई प्रोफाइल
ग्रेटर नोएडा। एसटीएफ के मुताबिक एमबीबीएस में अपने बच्चों को दाखिला दिलाने के लिए गिरोह के जाल में फंसे ज्यादातर लोग हाईप्रोफाइल हैं। इनमें विभिन्न पदों पर बैठे जिम्मेदार और बड़े अधिकारी भी शामिल हैं। इसके बावजूद वह गिरोह की पड़ताल किए बिना फंस गए। वहीं कुछ पीड़ित खुलकर सामने आने से भी कतरा रहे हैं।