राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के डीएसपी तंजील अहमद घटना के वक्त ऑन ड्यूटी थे। ऐसा दावा खुद एनआईए ने किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि कई बड़े आतंकवादी हमलों की जांच और कई जाली करेंसी के सिंडिकेट का भंडाफोड़ करने वाले मोहम्मद तंजील बिना सुरक्षा के बिजनौर में कैसे घूम रहे थे।
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उन्हें जिस वक्त गोलियों से भूना गया उस समय उनके पास न तो गनर था और न ही उन्होंने सर्विस पिस्टल रखी हुई थी। इस घटना में गंभीर रूप से घायल उनकी पत्नी फरजाना को नोएडा के फोर्टिस अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। एनआईए के आईजी संजीव कुमार के नेतृत्व में एक टीम फोर्टिस अस्पताल पहुंची। संजीव कुमार ने दावा किया कि तंजील अहमद की पोस्टिंग दिल्ली हेड क्वार्टर में थी और घटना के वक्त वह ऑन ड्यूटी थे।
परिजनों का कहना है कि अगर उनके पास गनर होता तो संभवत: उनकी जान बच जाती और हमलावर पकड़े जाते। इतना ही नहीं अगर हमलावरों को इस बात की जानकारी होती कि तंजील फुल प्रूफ सुरक्षा के साथ चल रहे हैं तो शायद उन पर हमला ही नहीं होता।
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सुनियोजित योजना के तहत की गई एनआईए अधिकारी की हत्या
तंजील अहमद बिजनौर के ही रहने वाले थे
- फोटो : ब्यूरो/ अमर उजाला, बिजनौर
क्या राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) अधिकारी तंजील अहमद की सनसनीखेज हत्या के तार आतंकवाद से जुड़े हैं। जांच में जुटी चार जांच एजेंसियां, एनआईए, दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल, यूपी एसटीएफ और एटीएस इसी सवाल का जवाब ढूंढने में लगी हैं। दरअसल एनआईए में प्रतिनियुक्ति से आए बीएसएफ के असिस्टेंट कमांडेंट तंजील की हत्या को जिस सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया, उससे जांच एजेंसियों के कान खड़े हो गए हैं।
एनआईए अधिकारी की हत्या के लिए बनाई गई मजबूत योजना, पेशेवर शूटरों और ऑटोमैटिक हथियारों का इस्तेमाल तथा ताबड़तोड़ चलाई गईं 24 गोलियां वारदात के तार आतंकवाद से जुड़े होने का इशारा कर रही हैं। तंजील वर्तमान में बिजनौर में हुए बम धमाके के अलावा कई अन्य संवेदनशील मामलों की जांच से जुड़े थे। एनआईए ने भी आधिकारिक तौर पर इसे सुनियोजित हमला करार दिया है।
एनआईए सूत्रों के मुताबिक हमलावरों को तंजील के अपनी भांजी की शादी में आने की पुख्ता जानकारी थी। हमलावरों ने इसी के आधार पर उन्हें मारने की योजना तैयार की। तंजील की समारोह स्थल से अपनी वैगन आर कार से वापसी के दौरान हमलावरों ने बाइक से उनका करीब आधे घंटे तक पीछा किया।
ईं 24 गोलियों में से 9 गोलियां शरीर के आर पार हो गईं
Firing
फिर कार को ओवरटेक करने के बाद ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं। इस दौरान तंजील की जीवित बचने की सारी संभावनाएं खत्म करने के लिए बेहद नजदीक से गोलियां बरसाई गईं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चलाई गईं 24 गोलियों में से 9 गोलियां शरीर के आर पार हो गईं।
सूत्रों के मुताबिक हमले में ऑटोमैटिक हथियार और 9 एमएम के बोर का इस्तेमाल किया गया है। साधारण अपराधी 9 एमएम की बोर का इस्तेमाल नहीं करते। इसके अलावा अगर यह पारिवारिक या अन्य तरह की रंजिश का मामला होता तो हमलावर परिवार के अन्य सदस्यों को भी निशाना बनाने से नहीं चूकते।
इस मामले में साफ तौर पर प्रतीत होता है कि हमलावर सिर्फ तंजील की हत्या करने के लिए आए थे क्योंकि उन्होंने उसी कार में बैठे उनके दोनों बच्चों को निशाना नहीं बनाया। चूंकि तंजील की पत्नी उनके बगल में बैठी थीं, इसलिए उन्हें तंजील को निशाने पर लेकर चलाई गई गोलियां लगीं।
उर्दू के अच्छे जानकार होने के कारण वह टीम के बहुत मददगार थे
मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए चार जांच एजेंसियों की 6 टीमें बनाई गई हैं। इनमें एनआईए और दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की एक-एक, यूपीए एसटीएफ और एटीएस की दो-दो टीमें शामिल हैं। तंजील आतंकवाद से संबंधित किन-किन मामलों की जांच से जुड़े थे, इसका खुलासा नहीं हो पाया है।
कहा जा रहा है कि वह फिलहाल बिजनौर धमाके की जांच से जुड़े थे। अपुष्ट सूत्रों के मुताबिक तंजील पठानकोट हमला मामले की जांच से भी जुड़े थे। जांच के लिए जब पाकिस्तान का संयुक्त जांच दल यहां आया तो तंजील ने संपर्क अधिकारी की भूमिका निभाई थी।
तंजील बीएसएफ में असिस्टेंट कमांडेंट थे। पांच वर्ष पूर्व उन्हें एनआईए में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया। उर्दू के अच्छे जानकार होने के कारण वह टीम के बहुत मददगार थे। टीम में शामिल अफसर व कर्मचारी उर्दू नहीं जानते थे, जबकि तंजील की इस भाषा पर अच्छी पकड़ थी। सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान व भारत से आतंकियों के उर्दू में आने वाले दस्तावेज और कोड के शब्दों को तंजील ही पढ़कर सुनाते थे। उर्दू में जो भी काम टीम के सामने आता, उसे तंजील ही अंजाम देते। उनके रहने से टीम को उर्दू के मामलों में कोई परेशानी नहीं होती थी।
उर्दू की गहरी समझ के कारण ही पठानकोट हमला मामले की जांच में भी उनकी सेवा ली गई थी। सूत्रों के अनुसार कहीं मुस्लिम आबादी में भेजने पर भी टीम तंजील अहमद की मदद लेती थी। वह मुस्लिमों में घुल मिलकर टीम की सहायता करते थे।