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Delhi: शाहदरा स्टेशन से गुजरने वाली ट्रेनों की बढ़ेगी गति और सुरक्षा, मुख्य लाइनों पर बिछेगा बैलेस्टलेस ट्रैक

Sun, 14 Dec 2025 12:58 PM IST
विजय पुंडीर शनि पाथौली, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

नई बैलेस्टलेस तकनीक के तहत गिट्टी की जगह कंक्रीट की मजबूत स्लैब डाली जाएगी, जिस पर रेल पटरियां फिक्स होंगी। रेलवे सूत्रों के अनुसार, बैलेस्टलेस ट्रैक पर ट्रेनें 130 से 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार आसानी से पकड़ सकेंगी।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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रेलवे ने शाहदरा स्टेशन की चारों मुख्य लाइनों (लाइन संख्या 1, 2, 3 और 4) पर आधुनिक बैलेस्टलेस ट्रैक बिछाने की तैयारी शुरू कर दी है। यह तकनीक पूर्व में मेट्रो ट्रेन, हाई-स्पीड कॉरिडोर और कुछ प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर इस्तेमाल की जा चुकी है।

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अब इसे व्यस्त रेलवे स्टेशनों पर प्रयोग में लाने का काम किया जा रहा है। शाहदरा स्टेशन दिल्ली का अहम जंक्शन है, जहां से प्रतिदिन लोकल, पैसेंजर और एक्सप्रेस ट्रेनें गुजरती हैं। यहां से नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली, गाजियाबाद, मेरठ और हापुड़ जैसे प्रमुख रूट सीधे जुड़े हुए हैं। अभी स्टेशन पर पारंपरिक गिट्टी (पत्थर) वाली पटरियां मौजूद हैं। इन पर ट्रेन के गुजरने के दौरान झटके और तेज आवाज महसूस होती है। 

नई बैलेस्टलेस तकनीक के तहत गिट्टी की जगह कंक्रीट की मजबूत स्लैब डाली जाएगी, जिस पर रेल पटरियां फिक्स होंगी। रेलवे सूत्रों के अनुसार, बैलेस्टलेस ट्रैक पर ट्रेनें 130 से 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार आसानी से पकड़ सकेंगी। इसका फायदा दिल्ली-मेरठ, दिल्ली-हापुड़ और दिल्ली-गाजियाबाद रूट पर सफर करने वाले लाखों यात्रियों को मिलेगा। अनुमान है कि इन रूटों पर यात्रा का समय 15 से 20 मिनट तक कम हो जाएगा, जिससे रोजाना अप-डाउन करने वालों का समय बचेगा। 
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धूल और ट्रेन के शोर से मिलेगी राहत
नई तकनीक में गिट्टी न होने के कारण धूल नहीं उड़ेगी। मौजूदा व्यवस्था में ट्रेन के गुजरने से गिट्टी उखड़कर प्लेटफॉर्म तक आ जाती है। इससे सफाई में परेशानी होती है और यात्रियों को भी असुविधा होती है। कंक्रीट स्लैब आधारित ट्रैक में यह समस्या लगभग खत्म हो जाएगी और स्टेशन परिसर की स्वच्छता में भी सुधार होगा। बैलेस्टलेस ट्रैक कंपन को भी कम करता है, जिससे ट्रेनों की आवाज घटेगी और आसपास के रिहायशी इलाकों को भी राहत मिलेगी।

लंबे समय तक नहीं पड़ेगी मेंटेनेंस की जरूरत
अभी पुरानी पटरियों पर हर दो से तीन महीने में टैंपिंग यानी गिट्टी को ठोकने और समतल करने का काम करना पड़ता है। इस दौरान कई बार ट्रेनों को घंटों तक रोका जाता है या उनकी रफ्तार सीमित करनी पड़ती है। बैलेस्टलेस ट्रैक में 8 से 10 साल तक किसी बड़े मेंटेनेंस की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे न केवल परिचालन सुचारू रहेगा, बल्कि रेलवे को रखरखाव पर होने वाला खर्च भी कम करना होगा। इस परियोजना पर करीब 11 करोड़ 40 लाख रुपये खर्च किए जाएंगे और इसे 18 महीनों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। निर्माण कार्य के दौरान कुछ लाइनों पर ब्लॉक या स्पीड रिस्ट्रिक्शन लगाया जा सकता है।

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