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गालिब के जन्म दिवस पर विशेष : कोई वीरानी सी वीरानी है, दश्त को देख के घर याद आया

Wed, 27 Dec 2023 06:22 AM IST
दुष्यंत शर्मा आशीष सिंह/ दीपक कार्की, नई दिल्ली

सार

मिर्जा गालिब को शायद ही इल्म रहा हो कि उनकी हवेली की वीरानगी कभी जंगल से भी ज्यादा होगी।
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बल्लीमारान में गालिब की हवेली... - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कोई वीरानी सी वीरानी है, दश्त को देख के घर याद आया...। इस शेर को कलमबद्ध करते हुए मिर्जा गालिब को शायद ही इल्म रहा हो कि उनकी हवेली की वीरानगी कभी जंगल से भी ज्यादा होगी। हवेली के मुख्य दरवाजे पर दर्ज शेर तस्दीक करता है कि अजीम शायर के यौम-ए-पैदाइश पर भी इसे दूर करने का कोई इंतजाम नहीं किया गया है। तभी भीड़-भाड़ वाली बल्लीमरान की संकरी गली कासिम जान में खुलती हवेली में मंगलवार आम लोगों की खास चहलकदमी नहीं दिखी। जिन चंद लोगों की आमद यहां रही भी, वह भी गली-गली भटकते यहां पहुंचे थे।

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मुंबई से पुरानी दिल्ली पहुंची पूनम चंद्रा की बातों में अपने अजीम शायर से शहर की बेरुखी का दर्द भी दिखा। बकौल पूनम, करीब बीस साल पहले जब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ती थी, तब गालिब के बारे में सुना। धीरे-धीरे उनकी शायरी से मोहब्बत होती गई। मुंबई में रहते हुए भी पढ़ना जारी है। बच्चे कई बार इस पर सवाल करते हैं। तभी उनको यहां दिखाने आई हूं कि मेरा अजीम शायर कभी पुरानी दिल्ली की गलियों में रहते थे। सालों बाद उनके जन्म दिन पर आई हूं, लेकिन दिल्ली की गालिब से बेरुखी साल रही है। कहीं से भी नहीं लग रहा कि शहर मिर्जा असदुल्लाह खां गालिब; जिन्हें देश-दुनिया मिर्जा गालिब के नाम से जानती है, को याद भी रख सका है। हवेली पूरी तरह से वीरान लग रही है।

अधिकतर दीवानों का यही दर्द : शिकायत पूनम की अकेली नहीं थी, वहां मौजूद गालिब के ज्यादातर दीवानों का दर्द यही रहा। और यह बेजा भी नहीं। उनके जन्मदिवस पर सजाने-सवांरने की छोडि़ए, धूल तक नहीं झाड़ी गई है। इसमें लगे परदे भी धूमिल नजर आए। दो दिन पहले एक जलसा हुआ भी था, जिसमें इस्तेमाल फूल तक मुरझाए पड़े थे। हवेली में अंदर रैक पर रखी उनकी किताबें धूल फांक रही हैं। उनके इस्तेमाल किए गए बर्तनों पर गर्द जमा है। हैरानगी इस बात की भी है कि गलियां हवेली जाने वालों की भूलभुलैया साबित होती हैं। पुरानी दिल्ली की किसी भी सड़क पर रास्ता बताने वाला कोई बोर्ड नहीं है। 
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नहीं पता कि गालिब का जन्मदिन कब है 
न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता, डुबोया मुझको होने ने, न मैं होता तो क्या होता...। नजदीक के दुकानदारों से जब गालिब के जन्मदिन के बारे में पूछा तो किसी को पता तक नहीं है कि मशहूर शायर मिर्जा गालिब का जन्मदिन है। हवेली की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मी बताते हैं कि भीड़-भाड़ वाली गली से बहुत कम लोग हवेली की तरफ रुख करते हैं। आने वाले ज्यादातर दूसरे शहरों के पर्यटक है। 15 दिन में औसतन करीब 100 लोग यहां पहुंचते हैं। इसमें साहित्य व शेरों-शायरी में रुचि रखने वालों की संख्या अधिक होती है। 

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