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क्या आप फरीदाबाद के बारे में ये बातें जानते हैं, पढ़ें कुछ खास बातें

Mon, 15 Aug 2016 10:11 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
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faridabad - फोटो : अमर उजाला
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सम्राट जहांगीर के खजांची रहे शेख फरीद द्वारा 1607 ईवी में बसाया गए इस शहर को 409 साल पूरे हो गए। शहर आजादी की 70वीं वर्षगांठ मना रहा है। बावजूद इन 70 सालों में लोगों को आज भी मूलभूत सुविधाओं से जूझना पड़ रहा है। पहले यह शहर गुडग़ांव जिले का हिस्सा हुआ करता था। 2 अगस्त 1979 को अलग कर इसे प्रदेश के 12वें जिले  के रूप में मान्यता दी गई।
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विकास के लिए अलग प्रशासन और नगर निगम बनाया गया लेकिन सुविधाओं के नाम पर यह शहर उस तरह से उन्नति नहीं कर पाया जिस तरह से एनसीआर के अन्य जिले कर पाए। जलभराव की समस्या शहर के लिए नासूर बन गई है। जाम तो यहां आम बात हो गई है। आजादी के 70 साल बाद भी जल संकट से आजादी नहीं मिली। औद्योगिक नगरी के नाम से मशहूर फरीदाबाद के उद्योग अंतिम सांस ले रहे हैं।

अवैध कब्जे और अतिक्रमण से नहीं मुक्त हो पाया शहर
फरीदाबाद। फरीदाबाद शहर आज चारों ओर अवैध कब्जे और अतिक्रमण की चपेट में है। आजादी के 70 साल बाद भी यह शहर न तो कब्जे से मुक्त हो पाया है और न ही अतिक्रमण से। शहर का कोई ऐसा इलाका नहीं बचा है जहां अतिक्रमण और कब्जे न हुए हों। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नगर निगम की ही 200 एकड़ से ज्यादा जमीन पर अवैध कब्जे हैं, लेकिन मौजूदा हालात देखकर निगम के आंकड़ें झूठे दिखाई देते हैं। ऐसी कोई सड़क नहीं जहां अवैध कब्जे न हों। स्मार्ट सिटी बनाने की तैयारी में जुटी सरकारी एजेंसियां शहर को स्लम सिटी के रूप में तब्दील कर चुके माफिया के आगे बेबस दिखाई देती हैं।  राजनीतिक संरक्षण के चलते पूरा शहर अतिक्रमण की चपेट में आया है। सबसे बुरा हाल एनआईटी इलाके का है। कई लोगों ने अवैध कब्जे और अतिक्रमण को लेकर हाईकोर्ट तक का दरवाजा खटखटा चुके हैं। लेकिन कोर्ट के आदेश के बाद भी न तो अवैध कब्जा होना रुका और न ही अतिक्रमण। इसका परिणाम अन्य शहरवासियों को भुगतना पड़ रहा है। आपको जानकर हैरानी होगी कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी भू माफियाओं ने प्रतिबंधित क्षेत्र अरावली को भी नहीं छोड़ा। वहां पर भी कब्जा कर मकान और फार्म हाउस बना लिए गए हैं।
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वर्जन: शहर में अवैध कब्जे और अतिक्रमण होना निगम अधिकारियों की लापरवाही है। अधिकारियों में बिल पॉवर की कमी के कारण ही ये काम हो रहे हैं। यदि सरकारी अधिकारी ईमानदारी और जवाबदेही से कार्य करे तो अवैध कब्जा और अतिक्रमण को रोकना असंभव नहीं होगा।-सुबोध नागपाल, सदस्य कंफेडरेशन, फरीदाबाद

राजनीतिक इच्छाशक्ति न होने से पिछड़ी औद्योगिक नगरी
एक तरफ फरीदाबाद को स्मार्ट सिटी का ताज पहनाने की तैयारी की जा रही है, लेकिन राज्य की सबसे पुरानी औद्योगिक नगरी के उद्योग आजादी के 70 साल बाद भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। राज्य की जीडीपी में 14 फीसदी की हिस्सेदारी निभाने वाले फरीदाबाद के 20 हजार से ज्यादा उद्यमियों को सड़क, बिजली और साफ सफाई जैसी सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं। इन हालातों के चलते देश और विदेश के निवेशक यहां कारोबार से हाथ खींच रहे हैं। जिले के 8 हजार लघु उद्योग हरियाणा ही नहीं पूरे देश की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की रीढ़ कहलाते हैं। 3 लाख से ज्यादा श्रमिकों वाला यह शहर 3 हजार करोड़ रुपये का सालाना निर्यात करता है, फिर भी सरकारों ने यहां विकास पर ध्यान नहीं दिया। 70 के दशक में फरीदाबाद के औद्योगिक विकास में जबरदस्त बूम आया। दस साल के अंतराल में ही इस शहर ने मैनचेस्टर की तर्ज पर अपनी पहचान कायम कर दी, लेकिन इसके बाद से ही सबसे पुरानी औद्योगिक नगरी फरीदाबाद के उलटे दिन शुरू हो गए। उद्योगों के इन हालात के पीछे रानीतिक इच्छाशक्ति की कमी बड़ी वजह रही है। पांच दशक में कई सरकारें बदलीं, लेकिन उद्योगों के विकास पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

वर्जन: उद्योगों की सबसे बड़ी समस्या इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर है। सरकार को इस ओर ध्यान देना होगा। औद्योगिक नगरी की खोई पहचान वापस लाने के लिए सरकार को विशेष ध्यान देना होगा। सड़क, बिजली, पानी और साफ सफाई जैसी मूलभूत सुविधाओं पर फोकस करना होगा। मदर यूनिट और एसएमई को बढ़ावा देने के प्रयास करने होंगे।-नवदीप चावला, अध्यक्ष-फरीदाबाद इंडस्ट्रीज एसोसिएशन

70 साल में नहीं विकसित हो पाया ड्रेनेज सिस्टम
फरीदाबाद। हरियाणा की पहचान माने जाने वाले फरीदाबाद ने कई उतार चढ़ाव देखे। बेशक 70 साल में दुनिया में अपना नाम भी रोशन किया लेकिन आज ड्रेनेज जैसी समस्या आज भी बरकरार है। फरीदाबाद के पिछडने की एक सबसे बड़ी समस्या यहां का बेकार ड्रेनेज सिस्टम माना जाता है। दशकों से इस समस्या से आजादी की मांग यहां के बाशिंदे उठा रहे हैं। ड्रेनेज के अभाव में हर साल बरसात के दिनों में फरीदाबाद तालाब में तब्दील हो जाता है। कॉलोनी से लेकर सेक्टरों तक पानी ही पानी नजर आता है। ऐसा नहीं है कि इसके लिए सिर्फ नगर निगम, हुडा व अन्य विभाग ही जिम्मेदार हैं, बल्कि यहां के जनप्रतिनिधियों की अनदेखी के कारण शहर का ये हाल हुआ है। लोगों ने अपने घरों के  सामने बनी नालियों को स्लेप डालकर ढक दिया। हर साल लाखों का बजट नालों की सफाई के लिए जारी किया जाता है, ताकि बरसात के दिनों में जलभराव न हो लेकिन महज कागजों में सफाई व्यवस्था कायम की जाती है। बारिश होते ही पानी घरों में सीवर लाइनें भी चोक पड़ी हैं।

वर्जन: अधिकारियों, राजनेताओं की इच्छा शक्ति और लोगों में सेवा भाव की कमी के कारण शहर के ये हालात पैदा हुए हैं। लोगों को शारीरिक रूप से आजादी तो मिल गई लेकिन मानसिक रूप से अभी भी तैयार नहीं हो पाए हैं। पॉलीथिन के उपयोग ने इस शहर का बेड़ागर्क कर दिया है। हम सब को मिलकर इस शहर को पॉलीथिन से मुक्त बनाना होगा।-डेंसन जोसेफ, सदस्य फरीदाबाद एक्शन ग्रुप

जाम ने बिगाड़कर रख दी फरीदाबाद की सूरत
किसी भी शहर की यातायात व्यवस्था को उसका की सूरत माना जाता है, लेकिन जाम की वजह से फरीदाबाद की सूरत लगातार बिगड़ती जा रही है। वाहनों के बढ़ते बोझ के आगे सड़कें सिकुड़ती जा रही है। आजादी के बाद देश तरक्की की राह पर आगे बढ़ा लेकिन औद्योगिक नगरी फरीदाबाद विकास के मामले में पिछड़ती गई। दशक पहले 2 से 3 लाख वाहन शहर में हुआ करते थे, लेकिन आज यह आंकड़ा 8 से 10 लाख पहुंच गया है। जिस रफ्तार से ट्रैफिक बढ़ा उसके मुकाबले सड़कों का विस्तार नहीं हुआ। रही सही कसर खराब सड़कों की वजह से पूरी हो गई। हाईवे से लेकर बाईपास तक कोई ऐसी जगह नहीं है, जहां लोगों को जाम से जूझना न पड़ता हो। सरकार राज्य में औद्योगिक निवेश की संभावनाएं तलाश रही है, लेकिन जाम के अंजाम से डर निवेशक फरीदाबाद से कदम पीछे खींच रहे हैं। ट्रैफिक के लिहाज से जरूरी माना जाने वाला ईईई का फॉर्मूला यहां दिखाई नहीं देता। रोड इंजीनियरिंग के अभाव के अलावा ट्रैफिक को लेकर एजुकेशन और इंफोर्समेंट में भी फरीदाबाद पिछड़ा हुआ है।

वर्जन: शहर की प्लानिंग में खामियों की वजह से जाम की समस्या बढ़ रही है। वाहनों की तादात के लिहाज से समय रहते सड़कों का विस्तार नहीं किया गया। अब काम चल भी रहे हैं तो बड़ी सुस्त गति से। खराब सड़कें, अतिक्रमण और नो पार्किंग जोन में अवैध पार्किंग जाम की समस्या को बढ़ा रहे हैं।-एसके शर्मा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष-रोड सेफ्टी ओर्गेनाइजेशन

प्रदूषण लगा रहा औद्योगिक नगरी की साख पर बट्टा
शहर के लोगों को प्रदूषण से आजादी कब मिलेगी, यही सवाल हर किसी के जहन में समय समय पर उठता है। कभी औद्योगिक विकास के लिए जानी जाने वाली औद्योगिक नगरी फरीदाबाद अब प्रदूषण के मामले में बदनाम मानी जाती है। सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल इस शहर की आबोहवा सुधरने की जगह बिगड़ती जा रही है। प्रदूषण फैलाने वाली यूनिटों पर तो शिकंजा कस दिया गया है, लेकिन वायु प्रदूषण बढ़ाने वाले वाहनों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। एनसीआर में प्रतिबंध के बावजूद डीजल ऑटो यहां खुलेआम दौड़ते हैं। सड़कों पर जहर उगलते वाहनों पर कार्रवाई करने की जरूरत नहीं समझी जाती। पीएम 2.5 की का आंकड़ा 300 तक पहुंच जाता है, जो सेहत के लिहाज से खतरनाक माना जाता है।

वर्जन: प्रदूषण से आजादी के लिए सरकार को ठोस निर्णय लेने होंगे। वाहनों से होने वाले प्रदूषण के साथ साथ कंस्ट्रक्शन से बिगड़ रही आबोहवा को सुधारना होगा। अकेले सरकार ही नहीं बल्कि लोगों को भी इसमें भागीदारी निभानी होगी। इसके लिए ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाने होंगे, क्योंकि हरियाली होगी तभी पर्यावरण सुरक्षित रहेगा।-नरेश वर्मा, पर्यावरण प्रेमी एवं उद्यमी

सड़कें हमारी जैसे ऊंट की सवारी...
राजधानी दिल्ली से सटी औद्योगिक नगरी फरीदाबाद की सड़कें देहात से भी बदतर स्थिति में हैं। सड़कों पर पैदल चल पाना आसान नहीं हैं, ऐसे में इनपर चलने वाले वाहनों की स्थिति क्या होती होगी अंदाजा खुद ब खुद लगाया जा सकता है। हाईवे हो या शहर के अंदरूनी मार्ग, गड्ढों और सड़क की जर्जर स्थिति जानलेवा बन रही है। सरकारें बदलती रहीं, लेकिन जनता को टूटी सड़कों से आजादी नहीं मिल सकी। कई जगह तो हालत इतनी बदतर है कि सड़क ही गायब हैं। नेता सड़कों के कायाकल्प के नाम पर करोड़ों रुपये की घोषणाएं कर नार रयल तो फोड़ते हैं, लेकिन हालत जस की तस बनी रहती है।

वर्जन: भ्रष्टाचार की जड़ें लगातार देश को खोखला कर रही हैं। इसका उदाहरण शहर के हालात देखकर लगाया जा सकता है। सड़कों को बनाने के नाम पर करोड़ों का हेरफेर हो जाता है। सड़कें बनाई भी जाती हैं तो कमीशनखोरी के चलते इतनी घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है कि बनने के चंद दिनों बाद ही टूट जाती हैं।-एडवोकेट एनएल जांगिड़, स्थानीय निवासी
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