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Silent Migration: एनसीआर में मौन प्रवास की आहट, वायु प्रदूषण से बदहाल होते हालात ने रहना-जीना किया मुहाल

Sat, 03 Jan 2026 06:18 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

दिल्ली-एनसीआर की जहरीली हवा अब केवल सांसों को नहीं, बल्कि लोगों के भविष्य के फैसलों को भी प्रभावित कर रही है।
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DELHI pollution - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में वायु प्रदूषण अब केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक और जनसांख्यिकीय चुनौती के रूप में उभर रहा है। हर वर्ष खराब और बेहद खराब श्रेणी में पहुंचने वाली हवा को लेकर यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या लोग अब दिल्ली-एनसीआर छोड़कर जाने लगे हैं। दिल्ली-एनसीआर की जहरीली हवा अब केवल सांसों को नहीं, बल्कि लोगों के भविष्य के फैसलों को भी प्रभावित कर रही है।

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लगातार बढ़ रहा जानलेवा वायु प्रदूषण धीरे-धीरे एक ऐसे साइलेंट माइग्रेशन को जन्म दे रहा है, जो न तो ट्रेनों की भीड़ में दिखता है, न ही आधिकारिक पलायन आंकड़ों में दर्ज होता है। यह पलायन शोर नहीं करता, लेकिन शहर की सामाजिक संरचना, श्रम बाजार और रहने योग्य भविष्य पर गहरा असर डाल रहा है। भारत सरकार या जनगणना कार्यालय की ओर से अब तक ऐसी कोई रिपोर्ट जारी नहीं हुई है जो यह घोषित करे कि एनसीआर से बड़े पैमाने पर स्थायी पलायन वायु प्रदूषण के कारण हो रहा है। 

हालांकि, कई सरकारी सलाहकार संस्थाओं, नीति आयोग से जुड़े शोध, शैक्षणिक अध्ययनों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने यह स्पष्ट किया है कि प्रदूषण अब पुश फैक्टर के रूप में काम करने लगा है। पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक और सुप्रीम कोर्ट की पूर्व संस्था  एनवायरनमेंट पॉल्यूशन कंट्रोल अथॉरिटी (ईपीसीए) ने रिपोर्टों में कहा है, एनसीआर में बनी प्रदूषण स्थिति शहर की लाइव एबिलिटी को प्रभावित कर रही है। 
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इसका अर्थ है किसी शहर या क्षेत्र में रहने की कुल गुणवत्ता यानी वहां का वातावरण इंसान के स्वास्थ्य, सुरक्षा, सुविधा व जीवन के लिए कितना अनुकूल है। जब वायु प्रदूषण, पानी की कमी, गंदगी, शोर, भीड़ और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते हैं तो उस शहर की लाइवएबिलिटी घटती है और यही गिरती हुई लाइव एबिलिटी अक्सर लोगों को चुपचाप शहर छोड़ने पर मजबूर करती है, जिसे साइलेंट माइग्रेशन कहा जाता है। ईपीसीए की रिपोर्टों में यह स्पष्ट उल्लेख है कि दिल्ली से उच्च-आय और पेशेवर वर्ग के लोग अपने बच्चों और बुज़ुर्गों के स्वास्थ्य को देखते हुए एनसीआर से बाहर स्थानांतरित हो रहे हैं। और विकल्प तलाश कर लोग इस पर बहुत गंभीरता से विचार कर रहे हैं। 

कोविड के बाद दिल्ली न लौटने वालों की खामोश कहानी 
दिल्ली स्थित श्रम और शहरी अध्ययन से जुड़े एक वरिष्ठ शोधकर्ता के अनुसार कोविड महामारी के बाद 1 लाख से अधिक लोअर मिडल क्लास और निम्न आय वर्ग के प्रवासी कामगार ऐसे हैं जो अपने मूल राज्यों से दिल्ली-एनसीआर वापस नहीं लौटे। शोधकर्ता बताते हैं कि इसकी वजह केवल रोजगार नहीं, बल्कि लगातार खराब वायु गुणवत्ता, पीने के पानी का संकट, कचरे से भरे इलाकों में रहने की मजबूरी और बदबूदार व अस्वस्थ माहौल भी है। 

प्रदूषण से प्रेरित पलायन
आईआईटी-कानपुर और आईआईटी-दिल्ली के संयुक्त शोध (2021-2023) में यह निष्कर्ष सामने आया कि एनसीआर में रहने वाले लगभग 20-25% शहरी परिवारों ने स्वीकार किया कि यदि कार्य और आय की बाध्यता न हो, तो वे बेहतर वायु गुणवत्ता वाले शहरों में स्थानांतरित होना चाहेंगे। शोधकर्ताओं ने इसे परसेप्शन-ड्रिवन माइग्रेशन कहा। जहां लोग पहले बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और कार्य-स्थल के वैकल्पिक मॉडल (वर्क फ्रॉम होम) के आधार पर निर्णय लेते हैं।

दीर्घकालिक जोखिम का संकेत
द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ और विश्व बैंक की रिपोर्टों में यह स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि वायु प्रदूषण का स्तर इसी तरह बना रहा, तो दिल्ली-एनसीआर जैसे मेगासिटीज में मध्यम वर्ग और कुशल श्रमिकों का धीमा लेकिन स्थायी आउट-माइग्रेशन शुरू हो चुका है, यह गिलास से एक बूंद पानी निकालने जैसा है। 

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