अमर उजाला के सह-संस्थापक श्री मुरारीलाल माहेश्वरी स्मृति राष्ट्रीय वाद-विवाद प्रतियोगिता में हरियाणा के विपिन शर्मा, उत्तराखंड की ऊषा पांडेय और हिमाचल प्रदेश की भावना शर्मा ने संयुक्त रूप से प्रथम स्थान प्राप्त किया। विपिन ने जहां विषय 'नई शिक्षा नीति नागरिकों में कर्तव्यनिष्ठा और वैज्ञानिक सोच विकसित करने में सहायक होगी?' के विपक्ष में सटीक तर्कों, बेहतर प्रस्तुतिकरण के साथ अपनी बात रखी।
वहीं, भावना और ऊषा ने पक्ष में बोलकर विजेता होने का गौरव पाया। उत्तर प्रदेश की सैयदा ने दूसरा और यशस्विनी ने तीसरा मुकाम हासिल किया। बेटियों के बढ़ते कदम इस प्रतियोगिता में भी दिखे, जहां पांच विजेताओं में चार छात्राएं हैं।
यह पहला मौका है जब कोरोना के खतरों की वजह से प्रतियोगिता ऑनलाइन आयोजित की गई। सोमवार को आयोजित इस प्रतियोगिता में विभिन्न राज्यों के कुल 13 प्रतिभागियों ने अपने-अपने तर्क रखे। पक्ष में जहां नई शिक्षा नीति को भारत के विश्व गुरु बनने में सहायक बताया गया तो विपक्ष में इसके लागू होनेे पर सवाल उठाए गए। इससे पहले जिला और मंडल स्तर पर आयोजित हुई प्रतियोगिताओं में सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया था।
प्रतिभागियों में दिखा उत्साह
सभी प्रतिभागियों के लिए यह अलग तरह का अनुभव था। वर्चुअल वाद-विवाद प्रतियोगिता में ज्यादातर पहली बार ही शामिल हुए। विजेताओं ने कहा कि शुरू मेें नेटवर्क और तकनीकी दिक्कत को लेकर अंदेशा था, लेकिन एक बार शुरू होने के बाद कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई और अपनी बात वैसे ही रख पाए जैसे मंचों पर रखते हैं।
अलग-अलग शहरों में बैठकर निर्णायकों ने किया फैसला
पारदर्शिता के लिए प्रतियोगिता के निर्णायकों का चयन अलग-अलग शहरों से किया गया था। नोएडा में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्योराज सिंह बेचैन थे तो आगरा में आंबेडकर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मोहम्मद अरशद। वाराणसी में बीएचयू के प्रोफेसर प्रकाश शुक्ला ने प्रतिभागियों का आकलन किया। इसके बाद सभी विशेषज्ञों के अंकों को जोड़कर विजेताओं का फैसला किया गया।
नई शिक्षा नीति के समर्थन और विरोध में अपने-अपने युवा तर्क
श्री मुरारीलाल माहेश्वरी स्मृति राष्ट्रीय वाद-विवाद प्रतियोगिता में शीर्ष विजेताओं के तर्कों के जरिये नई शिक्षा नीति के फायदे और इस पर उठने वाले सवालों को समझ सकते हैं। आइए, जानते हैं क्या हैं इसके फायदे और किस तरह इससे फायदा साबित होता नहीं दिख रहा।
1. विपिन शर्मा, फरीदाबाद, हरियाणा
विपक्ष में तर्क रखते हुए
लागू करना ही सबसे बड़ी चुनौती
नई शिक्षा नीति नागरिकों में कर्तव्यनिष्ठा और वैज्ञानिक सोच विकसित करने में सहायक होगी, ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसका लागू हो पाना ही मुश्किल है। केंद्र सरकार ने ही इसके लागू करने की समय सीमा 2040 तक रखी है। तब तक दुनिया में बहुत कुछ बदल जाएगा, हालात न जाने क्या होंगे? किसी भी देश के लिए शिक्षक और छात्र पूंजी होते हैं, लेकिन जिस देश में 2.35 रुपये रोज का बजट प्राथमिक शिक्षा पर खर्च होता हो, 28 रुपये प्रतिदिन पीएचडी पर तो क्या इस बजट के आसरे यह महत्वाकांक्षी नीति लागू की जा सकती है। क्या इतने बजट में छात्रों में वैज्ञानिक सोच पैदा की जा सकती है...बिल्कुल नहीं। स्कूलों में शिक्षकों की संख्या जब इतनी कम हो, शिक्षकों की गुणवत्ता खराब हो तो क्या यह नीति छात्रों का बेहतर कर पाएगी? आंकड़ों के आधार पर देखें तो जब वर्तमान शिक्षा नीति लागू की गई थी, तब भी वादा किया गया था कि जीडीपी का छह प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया जाएगा। नई शिक्षा नीति में भी यही वादा है। समय बदला, दस्तावेज बदले पर 50 साल बाद भी आंकड़ों का वादा वहीं का वहीं है। सबसे बड़ी चुनौती नई शिक्षा नीति को लागू करने की है।
1. भावना शर्मा, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश
वर्तमान शिक्षा सामाजिकता से दूर है
वर्तमान शिक्षा नीति आंखें बंद कर रट्टा मारने को बढ़ावा देती है। जो रोजगार तो दिला सकती है, लेकिन सामाजिकता और व्यावाहारिक ज्ञान से दूर है। रट्टा मारते-मारते सफल होने के लिए छात्र दिमाग पर बहुत ज्यादा दबाव डालते हैं और कई दफा इसी दबाव में आत्महत्या जैसा कदम भी उठा लेते हैं। ऐसी शिक्षा ग्रहण कर ही कई लोग बाद में सोशल मीडिया पर झूठ फैलाते हैं। नई शिक्षा नीति में सामाजिकता और व्यावहारिक ज्ञान सिखाया जाएगा जिससे देश के प्रति कर्तव्यबोध भी जगेगा। मसलन, पीसा की परीक्षा अलग-अलग क्षेत्रों में ली जाती है। एक बार इस परीक्षा में 72 देशों ने हिस्सा लिया और भारत का नंबर दूसरा था वह भी नीचे से। माना जाता है कि बच्चा सबसे ज्यादा अपनी मातृभाषा से सीखता है, अब जब उसे पांचवीं तक अपनी भाषा में सीखने को मिलेगा तो जाहिर तौर पर वह बेहतर इंसान तो बनेगा ही, वैज्ञानिकता भी विकसित होगी।
1. ऊषा पांडेय, नैनीताल
शिक्षा राष्ट्रनिर्माण की जरूरत है
वर्तमान शिक्षा पद्धति सिर्फ नौकरी का साधन ही मात्र ही दिखती है। जबकि शिक्षा रोजगार का साधन नहीं, राष्ट्रनिर्माण की जरूरत है। लोग देश और समाज के प्रति कर्तव्यों को भूल गए जो नई शिक्षा नीति दे सकती है। नई शिक्षा नीति में खेलकूद, सामाजिकता, सामंजस्य, अनुशासन और वैज्ञानिकता सिखाने के सभी प्रावधान किए गए हैं। जाहिर है कि ऐसी शिक्षा देश के प्रति उत्तरदायी बनाएगी न कि गलत इनसान। अब पांचवीं तक बच्चा अपनी मातृभाषा में पढ़ेगा तो जाहिर है कि वह बहुत सी कठिन बातें भी आसानी से समझ सकेगा और साथ ही साथ संस्कार भी सीखेगा। छठवीं से कोडिंग और वोकेशनल कोर्स की पढ़ाई शुरू की जाएगी जो न सिर्फ रोजगार दिलाएगी, बल्कि बेहतर इनसान बनाने में भी मदद करेगी।
2. सैयदा जेहरा जैदी, मेरठ, उत्तर प्रदेश
विश्वगुरु बनने में मिलेगी मदद
शिक्षा ऐसा माध्यम है जिसके कंधों पर संपूर्ण राष्ट्र का विकास टिका है। सब चाहते हैं कि हम देश को विश्वगुरु बनता देखें। अपने देश को दुनिया का लीडर बनता देखें, नई शिक्षा नीति में लीडर बनने की दिशा में ही कदम बढ़ाया गया है। कहा- वैज्ञानिक सोच क्या है? इस शब्द ने बड़े सामाजिक हिस्सों को भ्रमित किया है। लोग इसे न्यूटन के समीकरणों डार्विन के नियमों, आइंसटीन के तर्कों में ढूंढते हैं, जबकि वैज्ञानिक सोच का आधार प्रयोगात्मकता है, इसको बढ़ावा देना होगा। नई शिक्षा नीति इस सोच को पंख लगाती दिख रही है। सबसे पहले छठवीं से आठवीं तक इंटर्नशिप कराया जाएगा विषय को रटने के बजाए मूल सिद्धांत को समझाया जाएगा। बच्चे को रुचि के अनुसार कौशल विकास किया जाएगा, ताकि बेरोजगारी का बीज न पनपे। पहले जहां कला के विद्यार्थी सिर्फ कला के ही रह जाते थे अब उनमें भी वैज्ञानिक सोच पैदा की जा सकेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक भाषण का उदाहरण देते हुए अपनी बात रखी, कहा कि शिक्षा नीति का क्या सोचें से ज्यादा कैसे सोचें पर जोर है। नई शिक्षा नीति निश्चित ही नवाचार का प्रवाह शिक्षा के क्षेत्र में करेगा।
3. यशस्विनी शुक्ला, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
मूल निवासी कुशीनगर
नए पाठ्यक्रम सकारात्मक पहचान दिलाएंगे
नई शिक्षा नीति को भारतीय मूल्यों के अनुरूप है। वर्तमान शिक्षा जहां इस रोजगार के उद्देश्यों को लेकर आगे बढ़ती है। वहीं, नई शिक्षा नीति कर्तव्यबोध के साथ वैज्ञानिक चेतना भी बढ़ाएगा। नागरिकों में कर्तव्यनिष्ठा के विकास के संबंध में तर्क रखा कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में पढ़ाए जाने से बच्चा विज्ञान की भाषा संस्कारों के साथ सीख सकेगा। नए पाठ्यक्रमों में ऐसी तमाम बाते हैं जो सिर्फ रटने के बजाय वैज्ञानिक सोच पैदा करेंगे। जिससे रोजगार के साथ ही देश के प्रति कर्तव्यों का बोध होगा। नागरिकों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के लिए जब अपनी मातृभाषा में बच्चा पढ़ेगा तो अधिक स्वतंत्र महसूस करेगा। शैक्षिक वातावरण सहज होगा तो विश्लेषण की क्षमता पैदा होगी जो वैज्ञानिकता और रचनात्मकता के लिए प्रेरित करेगा।