साइबर सिटी की आबोहवा में घुलती जहरीली गैस, हवा में उड़ती धूल व मिट्टी सांसों के लिए खतरा बन गई है। बढ़ता प्रदूषण शहर के बाशिंदों को अस्थमा की चपेट में ले रहा है।
सिविल अस्पताल में जनवरी से अक्तूबर तक 10 महीने में 53440 मरीज आए हैं। बीते एक साल के मुकाबले 104.21 फीसदी मरीज सरकारी अस्पताल में अधिक आएं हैं। जबकि शहर के प्रमुख आठ निजी अस्पतालों में करीब 46 हजार से अधिक मरीज आए हैं।
इस साल करीब जिले में करीब एक लाख मरीज आए हैं। इस लिहाज से 18 लाख की आबादी वाले इस शहर हर 18वां आदमी सांस रोगी है।
10 महीने में 53 हजार से अधिक मरीज
सिविल अस्पताल में 2014 में 26149 मरीज आए थे, लेकिन इस साल महज 10 महीने में 53 हजार से अधिक मरीज आ चुके हैं। निजी अस्पतालों की ओपीडी में 25 फीसदी से अधिक बढ़ोतरी है।
ठंड के आमद के साथ बीते दो महीने में यह 15 फीसदी अधिक बढ़ोतरी हुई है। बदलती जीवन शैली की खामियां व प्रदूषण के कारण अस्थमा (दमा) अब घर-घर में पांव पसराने लगा है।
अस्पतालों में शिशु रोग विशेषज्ञ, फिजिशियन व दमा विशेषज्ञों के पास प्रतिदिन बड़ी संख्या में अस्थमा व सांस रोगी पहुंच रहे हैं।
धुंध और कोहरा बढ़ रहा है
अर्टिमिस अस्पताल के सांस रोग विशेषज्ञ (पुल्मोनोलॉजिस्ट) डॉ. हिमांशु गर्ग कहते हैं मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। जिस तरह धुंध और कोहरा बढ़ रहा है। ओपीडी में 20 फीसदी ओपीडी में इजाफा हुआ है।
फोर्टिस अस्पताल के पुल्मोनोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. मनोज गोयल कहते हैं प्रदूषण के साथ सांस रोगी बढ़ रहे हैं। अस्थमा के अलावा अन्य कई सांस रोगी ओपीडी में आने लगे हैं।
युवा भी चपेट में आए हैं। मरीजों को अस्थमा अटैक आने की संख्या में भी इजाफा हुआ है। बचने के लिए एहतियात बरतना जरूरी होता जा रहा है।
धूम्रपान नहीं करने के बावजूद सांस की समस्या
सिविल अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक यहां अक्सर गरीब तबके के मरीज आते हैं। बिल्डिंग साइट और ड्राइवर का काम करने वाले आसानी से इसके चपेट में आ रहे हैं।
वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. नवीन का कहना है कि अस्थमा रोग निरंतर बढ़ रहा है। सभी वर्गो के लोग इसकी चपेट में आ रहे हैं। इनहेलर थैरेपी से भी अस्थमा को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
एविस हेल्थ नामक संस्था की ओर से किए गए सैंपल सर्वे के तौर पर क्लास-1 और क्लास-2 अधिकारियों के फेफड़ों की क्षमता का टेस्ट किया गया, जिसमें पाया गया कि 68 फीसदी अधिकारियों को सांस लेने में तकलीफ है, जबकि 57 फीसदी में फेफड़े की क्षमता सामान्य से कम और 48 फीसदी अधिकारियों में अस्थमा के संकेत हैं।
30 फीसदी लोगों में धूम्रपान नहीं करने के बावजूद सांस की समस्या है। 21 फीसदी लोगों को महीने में किसी न किसी दिन खांसी रहती है, जबकि 8 फीसदी लोगों की कार्यक्षमता सांस संबंधी तकलीफ की वजह से प्रभावित होती है।