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केजरीवाल से हिसाब बराबर करना चाहेंगी शीला!

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दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर शीला दीक्षित स्टार प्रचारक होंगी, लेकिन ‘अमर उजाला’ से बातचीत में पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने चुनाव लड़ने से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि हमारे पास जनता को बताने के लिए बहुत कुछ है। वहीं, कांग्रेसी नेता शीला दीक्षित को आगे लाने के लिए फिर से सक्रिय हो गए हैं।
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मुख्यमंत्री का चेहरा होंगी या नहीं, यह तो पार्टी आलाकमान को तय करना है। लेकिन समर्थक नेता और प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता भी पूर्व मुख्यमंत्री को सक्रिय करना चाहते हैं।

उनका कहना है कि आम आदमी पार्टी की 49 दिन की सरकार और राष्ट्रपति शासन देखने के बाद जनता शीला दीक्षित के विकास कार्यों को याद करने लगी है। ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री चुनाव में बड़ा चेहरा साबित होंगी।
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शीला के करीबी नेताओं ने उठाई मांग

कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक चौधरी मतीन अहमद कहते हैं कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा, यह तो आलाकमान को तय करना है। लेकिन शीला दीक्षित को दिल्ली की राजनीति में सक्रिय होना चाहिए। दिल्ली के लिए वह बड़ा चेहरा हैं। जहां वे सभा में जाएंगी, उसमें लोग सुनने पहुंचेंगे। जो वह कहेंगी, लोग विश्वास करेंगे।

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस विधानसभा चुनाव शीला दीक्षित के 15 साल में कराए गए विकास के मुद्दे पर ही लड़ेगी। फिर आप की सरकार और भाजपा केराष्ट्रपति शासन से तुलना में भी आसानी होगी।

हालांकि पूर्वांचल वालों के लिए छठ पर भाजपा की तरफ से की गई छुट्टी पर शीला दीक्षित के आने पर सवाल जरूर पूछे जा सकते हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा' "पार्टी की सेवा मैं जब तक कर सकती हूं, करती रहूंगी। लेकिन चुनाव लड़ने के हक में मैं नहीं हूं। चुनाव नहीं लड़ूंगी। पार्टी को कहां देखती हैं के सवाल पर शीला ने कहा, अभी कुछ कहना जल्दी है। लेकिन हमारे पास जनता को बताने के लिए बहुत कुछ है। पहले क्या हुआ और फिर अब क्या हो रहा है। सबकुछ जनता को बताएंगे।"

बड़े चेहरों पर दांव लगा सकती है कांग्रेस

राजधानी में 15 साल तक लगातार सत्ता सुख भोगने वाली कांग्रेस वापसी करने के लिए जिताऊ चेहरों पर दांव लगाएगी। इसमें जहां नए ऊर्जावान उम्मीदवारों को मौका मिलेगा, वहीं दिग्गज नेताओं को भी विधानसभा चुनाव लड़ाने का मन कांग्रेस बना रही है।

इसमें पिछला लोकसभा चुनाव हारने वाले सांसदों के अलावा सिख दंगा से प्रभावित राजनीतिज्ञों को भी दिल्ली में हाथ मजबूत करने के लिए मौका देना शुरू हो गया है। दिल्ली में विकास का नारा लेकर चुनाव मैदान में उतारने का दंभ भरने वाली कांग्रेस को 2013 के चुनाव में महज आठ सीटें मिलीं।

‘आप’ यानी आम आदमी पार्टी ने बड़ी चपत लगाई जिसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा। कांग्रेस नेताओं के मुताबिक अबकी बार ऐसा नहीं होगा। कांग्रेस पहले मुस्लिम समुदाय और वाल्मीकि इलाकों में मेहनत नहीं कर रही थी। अब उन हिस्सों में भी काम करेंगे।
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यहां क्यों नहीं दिखी मोदी ल‌हर?

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह कहते हैं कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के 49 दिन और राष्ट्रपति शासन के दिनों के साथ कांग्रेस के कार्यकाल की तुलना होगी। फिर दिल्ली की कानून व्यवस्था, रुके हुए विकास कार्य, वृद्धावस्था पेंशन की दिक्कत के बावजूद अगर लोग भाजपा को चुनते हैं तो फिर कुछ नहीं कहा जा सकता। भाजपा ने दिल्ली में किए गए वादे पूरे नहीं किए हैं।

अरविंदर सिंह ने कहा कि हरियाणा और महाराष्ट्र में मोदी वेव में जीत की बात भाजपा बेशक कर रही है लेकिन यह मौजूद शासन के खिलाफ विरोध का परिणाम है। अगर मोदी वेव है तो फिर यूपी, राजस्थान व उत्तराखंड के उपचुनाव में वेव क्यों नहीं दिखी।

आगामी दिनों में झारखंड व जम्मू-कश्मीर में कुछ चमत्कार दिखे तो नहीं कह सकता लेकिन दिल्ली में मोदी वेव नहीं चलेगी। यह चुनाव इस बार चुनौतीभरा होगा। यहां एक साल से हमारी सरकार नहीं है। कांग्रेस की सीटें बढ़ेंगी।
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