दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का केरल के राज्यपाल पद से इस्तीफा देने के साथ ही दिल्ली प्रदेश कांग्रेस में नफा-नुकसान पर जोड़ घटा नेताओं ने शुरू कर दिया है।
शीला दीक्षित ने अभी इस्तीफा देने को लेकर बस इतना कहा है कि मन ने कहा और इस्तीफा दे दिया। लेकिन इस्तीफे के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। रिकॉर्ड 15 साल तक दिल्ली की कुर्सी संभालने वालीं शीला दीक्षित की सक्रिय राजनीति में वापसी होती है तो दिल्ली विधानसभा चुनाव का उनसे बड़ा चेहरा कांग्रेस के पास नहीं है।
दिल्ली में विधानसभा चुनाव हारने पर शीला दीक्षित को कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने केरल का राज्यपाल बना दिया। 11 मार्च, 2014 को वह केरल की राज्यपाल बनीं। तब यह बात उठी कि कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले और कुछ अन्य मामलों की फाइल संवैधानिक पद पर रहते हुए नहीं खुल सकती, इसलिए ऐसा किया गया।
शीला इनके लिए हो सकती हैं खतरे की घंटी
केरल के राज्यापाल पद से इस्तीफा दिए जाने के बाद जहां विरोधी शीला दीक्षित के लिए दबे मामलों के साथ आने वाली मुसीबत से जोड़ रहे हैं, वहीं समर्थक नेता दिल्ली को चेहरा मिलने की बात कर रहे हैं।
शीला दीक्षित ने जब केरल में राज्यपाल पद की शपथ ली तो समर्थक विधायक व पूर्व विधायक उसमें शामिल हुए। जब इस्तीफा देने की बातें दो-तीन दिन में उठीं तो पूर्व मंत्री रमाकांत गोस्वामी व प्रो. किरण वालिया समेत कुछ समर्थक सोमवार को मिलने पहुंचे। वहीं मंगलवार को विधायक चौधरी मतीन अहमद समेत कई नेता केरल भवन में शीला दीक्षित से मिलने पहुंचे।
दिल्ली में कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी शीला दीक्षित कार्यकाल के तेजतर्रार मंत्री अरविंदर सिंह को सौंपा था। विधायक दल के नेता हारून यूसुफ हैं तो प्रदेश प्रभारी डॉ. शकील अहमद और कुलजीत नागरा हैं। ऐसे में पार्टी का एक धड़ा यह कहता है कि आखिर कांग्रेस में अल्पसंख्यक के अलावा कोई दूसरा नेता नहीं है?
76 की उम्र में राज्यपाल के बाद सक्रिय राजनीति?
शीला दीक्षित का जन्म 31 मार्च, 1938 में कपूरथला, पंजाब में हुआ। गत विधानसभा चुनाव उन्होंने 75 साल की उम्र पार करने के बाद लड़ा। ऐसे में राज्यपाल के बाद सक्रिय राजनीति में वापसी करने वाले नेताओं की सूची छोटी है।
दिल्ली में कांग्रेस नेताओं के बीच की गुटबाजी छिपी नहीं है। वहीं अगर भाजपा या आम आदमी पार्टी किसी तिकड़म से सरकार बना लेती है तो शीला दीक्षित के लिए सक्रिय राजनीति के रास्ते पांच साल के लिए बंद हो सकते हैं।
शीला दीक्षित युग में हाशिये पर गए दिग्गज नेता सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर की सक्रियता बढ़ी है। वहीं अरविंदर सिंह प्रदेश की कमान संभाल रहे हैं जिन्हें अजय माकन भविष्य में मुख्यमंत्री के लिए अच्छा चेहरा बता चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस आलाकमान युवा नेतृत्व से कमान छीनकर अनुभवी को तरजीह देगी, इसे आसानी से राजनीतिक विश्लेषक स्वीकार नहीं कर रहे हैं।
प्रदेश कांग्रेस, मुख्य प्रवक्ता मुकेश शर्मा का कहना है कि कांग्रेस का कोई भी नेता अपमानित होकर राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर नहीं रहेगा। शीला दीक्षित पार्टी की कद्दावर नेता हैं, उन्हें अपना भविष्य खुद तय करना है। बाकी पार्टी आलाकमान है।
शीला दीक्षित का दिल्ली में स्वागत है। इस्तीफा दिया है तो घर बैठकर क्या करेंगी, दिल्ली को चेहरा मिल गये है। चुनाव हारें या जीतें, लेकिन उनकेनाम से पब्लिक जुटती है।