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जज्बाः आजादी की लड़ाई देखी, अब किसान हित के लिए लडूंगी

Mon, 28 Dec 2020 05:23 AM IST
दुष्यंत शर्मा अभिषेक पांचाल, नई दिल्ली
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जसविंदर कौर... - फोटो : amar ujala
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हर नए दिन के साथ किसान आंदोलन व्यापक रूप लेता जा रहा है। लाखों अन्नदाता इस समय राजधानी की सीमाओं पर डटे हुए हैं। इनमें छोटे बच्चों से लेकर बड़ी तादाद में बुजुर्ग भी शामिल हैं। ऐसी ही एक महिला है जसविंदर कौर जिन्होंने 15 साल की उम्र में 1945 में हुई आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों से लोहा लिया था। अब वह दिल्ली के टीकरी बॉर्डर पर आंदोलन में भी हिस्सा ले रही हैं।

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उनका कहना है कि जब तक केंद्र सरकार कृषि कानून वापस नहीं लेती, वह आंदोलनरत किसानों के साथ डटी रहेंगी। दिल्ली के नांगलोई इलाके की रहने वाली जसविंदर कौर ( 90) मूल रूप से पंजाब के संगरूर जिले की रहने वाली हैं। कड़ाके की ठंड और कोरोना के डर के बावजूद वह पिछले एक सप्ताह से टीकरी बॉर्डर पर किसानों का समर्थन कर रही हैं।

उन्होंने बताया कि देेश की आजादी के लिए जिस प्रकार से उन्होंने संघर्ष किया था, उसी प्रकार किसान आंदोलन में भी वह अन्नदाताओं के हित के लिए लड़ेंगी। किसानी उन्हें विरासत में मिली है और वह अपनी चौथी पीढ़ी देख रही हैं। उनके कुनबे में 130 लोग हैं। सब किसी न किसी प्रकार से खेती से जुड़े हुए हैं।
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जसविंदर कहती हैं कि कई दिनों से वह टीवी पर किसान आंदोलन की खबरें देख रही थी। उन्होंने देखा कि कड़ाके की ठंड में भी किसान सड़कों पर डटे हुए हैं। कई अन्नदाताओं की जान भी जा चुकी है। यह देखकर उन्हें काफी पीड़ा हुई। उन्होंने ठाना कि हक की इस लड़ाई में वह भी आंदोलन में शामिल होंगी और कानूनों की वापसी तक किसानों को समर्थन देती रहेंगी।

1965 में आईं दिल्ली
जसविंदर बताती हैं कि 1965 में वह पंजाब से दिल्ली आकर बस गई थी। तब से यही रह रही हैं। 1984 के सिख दंगों का भयानक रूप भी उन्होंने देखा है। उनका कहना है कि सरकार को किसानों की समस्या को देखते हुए कृषि कानूनों को जल्द से जल्द वापस कर लेना चाहिए।

हमेशा याद रहेंगी तीन तारीखें
जसविंदर ने कहा कि वह अपने जीवन में तीन तारीखों को हमेशा याद रखेंगी। पहला,  1947 जब उनके सामने देश आजाद हुआ था। दूसरा 1984 के सिख विरोधी दंगे और तीसरा 2020, जब देश और दुनिया पर कोरोना वायरस का साया छाया। उन्होंने कहा कि जब 1965 में वह दिल्ली आई थी। उस दौरान यमुना नदी के आसपास के कई किलोमीटर के क्षेत्र में खेतीबाड़ी होती थी, लेकिन वक्त के साथ-साथ सब कुछ बदल गया।

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