मेहनत-मजदूरी करने वाले अधिक
दिल्ली राज्य कैंसर संस्थान के हेड एंड नेक सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. राहुल अग्रवाल के अनुसार, विभाग में हर महीने मरीजों की संख्या बढ़ रही है। शुरुआती चरण में ओरल कैंसर का पता चल जाए तो कई मामलों में केवल सर्जरी से ही अच्छा इलाज संभव है। बीमारी बढ़ने पर कीमोथेरेपी और रेडिएशन समेत अन्य उपचार की जरूरत पड़ सकती है। उनके अनुसार, सिर और गर्दन का कैंसर मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोगों में ज्यादा देखने को मिल रहा है। अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों में मजदूर, ड्राइवर, दर्जी और दूसरे मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं। काउंसलिंग के दौरान कई मरीज बताते हैं कि वे लंबे समय से पान मसाला, गुटखा या दूसरे तंबाकू उत्पाद मुंह में रखते रहे हैं। लगातार तंबाकू के संपर्क में रहने से मुंह की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है और समय के साथ कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
पिता के पान मसाले ने 14 साल की बच्ची को पहुंचाया अस्पताल
डॉ. राहुल अग्रवाल ने एक 14 साल की बच्ची का मामला भी बताया, जो उनके करियर में ओरल कैंसर की सबसे कम उम्र की मरीज थी। डॉक्टर के मुताबिक, बच्ची के पिता पान मसाला खाते थे। एक बार उन्होंने पान मसाला थूका, जिसे बच्ची ने गलती से मुंह में डाल लिया। इसके बाद वह ऐसा बार-बार करने लगी। लंबे समय तक तंबाकू के संपर्क में रहने के बाद बच्ची में कैंसर की समस्या सामने आई। उन्होंने बताया कि सिर और गर्दन के कैंसर का एक प्रमुख कारण शराब का सेवन भी माना जाता है। लंबे समय तक अधिक शराब पीने से मुंह, गले और भोजन नली समेत शरीर के कई हिस्सों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। तंबाकू के साथ शराब का सेवन करने पर जोखिम और बढ़ सकता है।