राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को निरस्त करने के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। मालूम हो कि एनजेएसी के जरिए शीर्ष अदालत और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति में सरकार ने दखल देने की कोशिश की थी।
संविधान में संशोधन कर सरकार ने कोलेजियम सिस्टम को खत्म करते हुए एनजेएसी के जरिए जजों की नियुक्ति का निर्णय लिया था। लेकिन 16 अक्टूबर, 2015 को पांच सदस्यीय संविधान पीठ(4:1) ने बहुमत केआधार पर एनजेएसी को निरस्त कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ नेशनल लॉयर्स कंपेन फॉर ज्यूडिशियल ट्रांसपरेंसी एंड रिफॉर्म ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी।
चीफ जस्टिस रंजन गोगई, न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर, न्यायमूर्ति कूरियन जोसफ, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने पाया कि पुनर्विचार याचिका दायर करने में 470 दिनों की देरी हुई है और याचिकाकर्ता केपास इस देरी का संतोषजनक उत्तर नहीं था।
पीठ ने कहा कि पुनर्विचार याचिका महज देरी के आधार पर भी खारिज हो सकती है। लेकिन पीठ ने यह भी कहा कि याचिका में मेरिट का अभाव है। लिहाजा याचिका दायर करने में देरी और मेरिट केअभाव के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी।
सनद रहे कि 16 अक्टूबर, 2015 को पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने एनजेएसी को न्यायपालिका की स्वतंत्रता में दखल बताया था। संविधान पीठ ने कहा था कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। संविधान पीठ ने एनजेएसी को निरस्त करते हुए कोलेजियम सिस्टम को बहाल रखा था।