वरिष्ठ साहित्यकार मंगलेश डबराल के निधन की खबर से जनसत्ता सोसायटी में शोक की लहर दौड़ गई। साहित्य प्रेमियों ने उनके निधन को अपूरणीय क्षति बताया है। चार दिसंबर की रात में उन्हें बेटी व भांजे ने वसुंधरा के अस्पताल से एम्स की आईसीयू में रेफर कराया था।
72 वर्षीय कवि मंगलेश डबराल वसुंधरा की जनसत्ता सोसायटी में पत्नी संयुक्ता डबराल और बेटी अलमा डबराल (30) के साथ रहते थे। वह वर्ष 2012 में गाजियाबाद स्थित वसुंधरा में फ्लैट पर आए थे। बेटा मोहित (36) गुरुग्राम की एक कंपनी में स्क्रिप्ट राइटर हैं। वह पत्नी और बेटी के साथ गुरुग्राम में ही रहते हैं।
अलमा ने बताया कि 27 नवंबर को मंगलेश डबराल की तबीयत खराब होने पर उन्हें वसुंधरा के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया था। कोविड-19 टेस्ट रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई थी। अस्पताल में इलाज से उनकी तबीयत ठीक हो गई थी। लेकिन किडनी में बढ़ते इंफेक्शन से उनकी तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ गई। इसके बाद उन्हें अलमा और भांजे प्रमोद ने चार दिसंबर की रात में एंबुलेंस से दिल्ली के एम्स ले जाकर आईसीयू में भर्ती करा दिया।
डॉक्टरों ने तबीयत ज्यादा खराब होने के बाद पांच दिसंबर को मंगलेश को वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर दिया। इस बीच ऑक्सीजन लेवल कम होने के कारण किडनी ने काम करना बंद कर दिया था। अस्पताल में बुधवार की शाम करीब साढ़े छह बजे उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा था आया और 07:10 बजे दूसरी बार दौड़ा पड़ने से उनका निधन हो गया।
आखिरी बार बेटी और पत्नी से की वीडियो कॉल, मांगी कॉफी
बेटी अलमा ने बताया कि उनके पिता मंगलेश डबराल से आखिरी बार बात तीन-चार दिन पहले वीडियो कॉल से हुई थी। पिता ने कहा कि वह अब थक चुके हैं, उन्हें कब अस्पताल से डिस्चार्ज किया जाएगा। अब वह घर पर आना चाहते हैं। इससे पहले चार दिसंबर की रात में भी अलमा ने पिता को एम्स में रेफर कराने के दौरान उनके पैरों को मसला था। जिससे मंगलेश को काफी आराम हुआ। तब उन्होंने कागज पर लिखकर बेटी से चाय या कॉफी मांगी थी।
इतिहास और उपलब्धियां
16 मई 1948 को टिहरी गढ़वाल के काफलपानी गांव में जन्मे मंगलेश डबराल की शिक्षा और दीक्षा देहरादून में हुई थी। दिल्ली में कई काम करने के बाद वह मध्यप्रदेश चले गए थे। वहां कला परिषद, भारत भवन से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका पूर्वाग्रह में सहायक संपादक रहे। लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित अम्रत प्रभात में भी नौकरी की थी। इसके बाद वह वर्ष 1963 में दिल्ली में जनसत्ता में साहित्य संपादक भी रहे। वर्तमान में वह नेशनल बुक ट्रस्ट से भी जुड़े थे। उन्होंने पांच काव्य संग्रह भी लिखें। जिनमें पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं आवाज भी एक जगह है और नए युग में शत्रु शामिल हैं। उन्हें कई बड़े अवॉर्ड से भी सम्मानित हो चुके थे।