दिल्ली सरकार और उसकी एजेंसियों को कोर्ट ने लगाई फटकार
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अमर उजाला ब्यूरो नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने कड़ाके की ठंड में अस्पतालों के बाहर सोने को मजबूर मरीजों और उनके तीमारदारों की दयनीय स्थिति पर सख्त रुख अपनाते हुए दिल्ली सरकार और उसकी एजेंसियों को फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने बुधवार को कहा कि दिल्ली सरकार या उसकी एजेंसियां आश्रय प्रदान करने की अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकतीं। अदालत ने इसे नागरिकों का मौलिक अधिकार बताते हुए तत्काल सुविधाएं उपलब्ध कराने के सख्त निर्देश दिए।
पीठ ने डूसिब को निर्देश दिया कि बुधवार शाम तक सरकारी अस्पतालों के पास उपलब्ध सबवे को अपने कब्जे में लेकर रैन बसेरे में तब्दील करे। साथ ही, अस्पतालों के आसपास उपलब्ध जगहों पर तुरंत टेंट या पंडाल लगाकर ज्यादा से ज्यादा मरीजों व उनके परिजनों को आश्रय उपलब्ध कराया जाए। अदालत ने एमसीडी, डीडीए, डूसिब जैसी भूमि मालिक एजेंसियों को पूर्ण सहयोग करने का आदेश दिया। पीठ ने चेतावनी दी कि इन निर्देशों का पालन न करने पर संबंधित अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाएगा। यह निर्देश दिल्ली पुलिस और डीएमआरसी पर भी लागू होंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि ये लोग अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि बेहतर चिकित्सा सुविधा की तलाश में मजबूर होकर अस्पताल पहुंचते हैं। ऐसे में संसाधनों की कमी या अनुदान की कमी का हवाला देकर सुविधाएं देने से इनकार नहीं किया जा सकता।सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के स्थायी अधिवक्ता आशीष दीक्षित ने बताया कि उन्होंने मंगलवार रात एम्स और आसपास के रैन बसेरों का दौरा किया और कुछ सुझावों के साथ नोट तैयार किया। उन्होंने अदालत को एम्स के पास सबवे और खुले में सो रहे लोगों की तस्वीरें भी सौंपीं।
यह कार्रवाई अदालत द्वारा एक समाचार रिपोर्ट का स्वत: संज्ञान (सुओ मोटू) लेकर शुरू की गई जनहित याचिका पर हुई। रिपोर्ट में बताया था कि एम्स में इलाज के लिए आए कई मरीज और उनके परिवार वाले खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर हैं, क्योंकि रैन बसेरे भरे हुए हैं और सुविधाओं की कमी है।