फैक्ट्रियों में काम बंद होने से बेकार हुए कामगार एक बार फिर अपने प्रदेशों को लौटने लगे हैं। कुछ मजदूर पैदल ही अपने घरों को लौट रहे हैं तो कुछ को विशेष ट्रेन शुरू होने का इंतजार है। लॉकडाउन का एक महीना बीतने के बाद यह मजदूर किसी भी तरह अपने प्रदेशों को लौटना चाहते हैं।
गुरुग्राम की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करने वाले फरुर्खाबाद निवासी मनोज, सुरजीत और ब्रजेश ने बताया कि काम बंद होने के बाद उन्होंने किसी तरह एक महीने तक गुजारा किया। उन्हें न तो मालिक ने पैसे दिए और न ही आगे खर्च के लिए अब पैसा बचा है, इसलिए गांव जाना मजबूरी है। सोहना में काम करने वाले एक दैनिक मजदूर ने बताया कि उसे न तो पिछले महीने का पैसा दिया गया और न अब उसके पास पैसे बचे हैं।
बिहार के नवादा निवासी राम भगवान ने बताया कि फैक्ट्री बंद होने के बाद अब घर जाना चाहते हैं क्योंकि बचत के पांच हजार रुपये जब खत्म हो गए तो लाइन में लगकर खाना खाया। जेब में अब 200-300 रुपये बचे हैं, इसलिए ट्रेन से जाने का इंतजार कर रहे हैं। एक फैक्ट्री में काम करने वाले सतेंद्र ने बताया कि इजाजत मिलती तो बाइक से ही झारखंड चला जाता, लेकिन कोई बताने वाला नहीं कि किससे मदद लें।
कोरोना सेस से हो गरीबों का हो निजी अस्पताल में इलाज : आरडब्ल्यूए
पूर्वी दिल्ली के आरडब्ल्यूए ने दिल्ली सरकार की ओर से शराब पर लगाए गए कोरोना टैक्स से प्राप्त राशि को गरीबों का निजी अस्पताल में कोरोना के इलाज पर खर्च करने की मांग की है। इस संबंध में ईस्ट दिल्ली आरडब्ल्यूए ज्वाइंट फ्रंट के अध्यक्ष बीएस वोहरा ने कहा कि सरकार ने शराब पर 70 फ़ीसदी कोरोना टैक्स लगाया है। इसके बाद भी शराब की दुकानों पर भीड़ कम नहीं हो रही है। दुकान के बाहर शारीरिक दूरी के नियम का पालन भी नहीं हो रहा है। इससे कोरोना संक्रमण और बढ़ने का खतरा बना हुआ है।