पश्चिम बंगाल से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर एक कद्दावर नेता के रूप में उभर रहे प्रिय रंजन दासमुंशी 12 अक्तूबर, 2008 को आए हृदयाघात से कभी उबर नहीं पाए। दिल का दौरा पड़ने के साथ ही उन्हें लकवा भी मार गया था।
उनके दिल के बाएं हिस्से ने काम करना बंद कर दिया था और इसकी वजह से उनके मस्तिष्क में खून की सप्लाई बंद हो गई थी। वे कोमा की स्थिति में चले गए थे। वे न तो बोल पाते थे और न ही किसी को पहचान पाते थे, हालांकि उनके दिमाग के अलावा शरीर के बाकी अंग ठीक से काम कर रहे थे।
दौरा पड़ने के बाद उन्हें सबसे पहले एम्स लाया गया था, लेकिन कुछ दिनों के बाद उन्हें अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वर्ष 2009 में उन्हें स्टेम सेल थेरेपी के लिए जर्मनी ले जाया गया।
वहां से आने के बाद उनकी सेहत में मामूली सुधार देखा गया लेकिन वह अस्थायी साबित हुआ। वर्ष 2011 में अपोलो अस्पताल ने उनके परिजनों से उन्हें घर ले जाने को कहा था लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हुए थे। परिजनों को घर में संक्रमण का खतरा था।
सरकार ने उठाया खर्च
एक अनुमान के मुताबिक दासमुशी के इलाज पर रोजाना लगभग 30-40 हजार रुपये खर्च हो रहे थे। यह सारा खर्च लोकसभा सचिवालय उठा रहा था। जब केंद्र में 2014 में मोदी सरकार आई तो उसने भी दासमुंशी के इलाज का खर्च उठाने की घोषणा की थी।