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मिसाल: 40 वर्षों से गायों की सेवा कर रहा है एक मुस्लिम परिवार

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दादरी के बिसाहड़ा गांव में जहां एक ओर गोहत्या को लेकर बवाल मचा हुआ है, वहीं दनकौर कस्बे का रहने वाला एक मुस्लिम परिवार सद्भावना और भाईचारे की मिसाल पेश कर रहा है।
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ये परिवार पिछले 40 सालों से कस्बे की द्रोण गऊशाला में गायों की देखभाल करता आ रहा है। इतना ही नहीं गऊशाला के गेट पर तैनात गार्ड भी मुस्लिम समुदाय के हैं।

मजे की बात यह है कि गायों का दूध दोहने वाले हबीब को सभी ग्वाला कहकर पुकारते हैं। दनकौर स्थित द्रोण गऊशाला करीब 120 वर्ष पुरानी है। इस समय गऊशाला में करीब 800 गाय और बछड़े हैं।
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आधी से ज्यादा जिंदगी गायों की सेवा में गुजार दी

इनकी देखभाल, चार, साफ-सफाई और गायों को नहलाने का कामकाज एक मुस्लिम परिवार कर रहा है। ये हैं दनकौर के गढ़ी मौहल्ला निवासी 55 वर्षीय हबीब, पत्नी रुकसाना, बेटी रुकसार, बरिशा, अमीना और लड़के सलमान और राशिद गायों को नहलाना, चारा खिलाना और गऊशाला की साफ-सफाई करते हैं।

हबीब 10 साल की उम्र से ही इस गऊशाला में काम कर रहे हैं। यहां उन्होंने अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी गायों की सेवा में गुजार दी। शादी की और अब बच्चे भी उनके साथ गायों की सेवा में लगे हैं।

रुकसाना का कहना है कि पगार कम है। बढ़ाई नहीं जा रही है, लेकिन फिर भी हम गायों की सेवा के बिना अब अपना जीवन नहीं जी सकते।
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कभी दूसरे सुमदाय का होने जैसा अहसास नहीं हुआ

रुकसाना ने बताया कि पिछले 40 सालों में गऊशाला में रहने वाली गायों से उनका विशेष लगाव हो गया है। गऊशाला समिति की ओर से पूरे महीने की 16 हजार रुपये की पगार दी जाती है।

इन्हीं गायों का काम करने से मिलने वाली पगार से पूरे घर का पालन-पोषण चलता है। उन्होंने बताया कि बिसाहड़ा में पशुवध की बात पर जो बवाल मचा है वह बेहद दुखद है।

ये दोनों समुदायों के लोगों के बीच प्यार और भाईचारे में दरार डालने वाले लोगों की साजिश है। पिछले 40 सालों से गऊशाला की सेवा करते हुए हमे कभी दूसरे सुमदाय का होने जैसा अहसास नहीं हुआ।
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