दिल्ली-एनसीआर के घने प्रदूषण ने पेड़-पौधों का दम घोंटा है। इसकी चपेट में आने से परिंदों की सांसें भी उखड़ी हैं। पेड़ों की पीली पड़तीं सूखती पत्तियां और अस्पतालों में बड़ी संख्या में पहुंचते घायल पक्षी इसकी तस्दीक भी करते हैं।
विशेषज्ञों की मानें तो घने प्रदूषण ने पेड़-पौधों के कुदरती विकास को तो धीमा किया ही है, साथ ही प्रदूषकों को सोखने की इनकी क्षमता भी खत्म की है। दिल्ली-एनसीआर की दिक्कत इसलिए भी ज्यादा है कि यहां प्रभावी प्रदूषक धूल के महीन, सल्फर व नाइट्रोजन के ऑक्साइड और ओजोन हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि दो से तीन महीने तक हवा में पीएम 10 की मात्रा ज्यादा होने पर पौधों की विकास दर 30-50 फीसदी तक गिर जाती है। वहीं, वातावरण से गैसों के आदान-प्रदान में भी बाधा आती है। इससे वनस्पतियों के प्रदूषण सोखने की क्षमता गिरती है। सामान्य अवस्था में जो पौधा जितना ज्यादा हवा को साफ करता है, उसमें उतनी ही गिरावट आती है।
भारतीय पुरातत्व विभाग के निदेशक, हॉर्टिकल्चर एस. चेलैया के मुताबिक, इंसानों की तरह वनस्पतियों पर भी प्रदूषण का असर पड़ रहा है। दिल्ली में इस वक्त जो पत्तियां पीली पड़ रही हैं, पीपल सरीखे पेड़ों तक से यह सूखकर गिर रही हैं, यह घने प्रदूषण का ही नतीजा है। लंबे दौर का प्रदूषण पेड़-पौधों को कुपोषित कर रहा है।