तख्त व ताज की शतरंजी बिसात के चौसर पर शह मात के खेल में कब कौन प्यादा बन जाए पता भी नहीं चलता। पांच दिन पहले हुआ सुनपेड़ का अग्निकांड किसी शतरंजी बिसात से कम नहीं है।
इस शतरंजी खेल में जहां पिछले साल से गांव में तीन लोगों की निर्मम हत्या हुई। वहीं, इस साल भी दलित परिवार को जिंदा जलाने की कोशिश हुई, जिसमें दो मासूम बच्चों को जान गंवानी पड़ी।
जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर सुनपेड़ की राजनीति बंगला वाले परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। इस परिवार ने कभी भी गांव की राजनीति को अपने घर की दहलीज से बाहर नहीं जाने दिया।
साजिश के मास्टरमाइंड पर सस्पेंस बरकरार
यहां से बृगभान, राजपाल, दुलीचंद जेलदार, बिजेंद्र और बलवंत ने गांव पर राज किया। लेकिन समय के साथ सत्ता के मजा ने अब बंगला वाले परिवार को कई गुटों में बांट दिया है।
सत्ता हथियाने के लिए बंगला परिवार के लोग अब एक-दूसरे पर व्यंग्यात्मक तीर ही नहीं चलाते, बल्कि अदालती चक्कर भी लगा रहे हैं।
गांव में चर्चा है कि दलित परिवार में हुआ अग्निकांड इसी सत्ता को लेकर है। हालांकि अभी कांड का मास्टमाइंड कौन है? इस पर जितने मुंह, उतनी बातें हैं। कोई भी खुलकर बोलने को तैयार नहीं है।
सत्ता की चाभी-
नाम न छापने की शर्त पर एक व्यक्ति ने बताया कि 1983 के बाद गांव की सत्ता का केंद्र बिंदु बलवंत रहा है। जिसके कारण वह एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार सरपंच पद पर पहुंचा।
2005 के चुनाव बलवंत ने अपने चचेरे भाई बिजेंद्र के अलग होने के बावजूद प्रतिद्वंद्वी राजेश बोहरे को सात वोटों से हारा।
सियासी खींचतान के आधार
प्रभाती के खेवनहार-
2001 में सरपंच पद आरक्षित होने के कारण जब अग्निकांड के पीड़ित जितेंद्र की दादी प्रभाती की नैया भी आरोपी बलवंत ने ही पार लगाई थी। जिसकी पुष्टि खुद प्रभाती के प्रतिद्वंद्वी रहे रामप्रकाश करते हैं।
वे बताते हैं कि बलवंत के साथ उसकी सदा खटपट रही। इसलिए बलवंत ने प्रभाती को मेरे खिलाफ खुलकर समर्थन किया था। प्रभाती, बलवंत से हर पंचायती काम में सलाह लेती थी।
सत्ता की लड़ाई-
लोग अब अग्निकांड को सत्ता की लड़ाई से जोड़ने लगे है। चर्चा है कि अग्निकांड में 70 वर्षीय बलवंत का नाम इसलिए लिया गया है, ताकि सत्ता की लड़ाई में बलवंत सदा-सदा के लिए बाहर हो जाए।
सरपंच पद के उम्मीदवार बिजेंद्र कहते हैं कि बलवंत का साथ मिलने से इस बार चुनावी नैया पार हो जाती। लेकिन सत्तालोलुप लोग इस हादसे को चुनावी फायदे को इस्तेमाल कर रहे हैं।