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दिल्ली: चीनी, नमक और हवा से शरीर में घुल रहा प्लास्टिक का जहर, वैज्ञानिक शोध में ये बात आई सामने

Sat, 17 Oct 2026 08:53 AM IST
Vijay Singh Pundir अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

वैज्ञानिक शोध में नमक-चीनी से लेकर इंसानी खून और फेफड़ों तक में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी सामने आई है। हालांकि, अलग-अलग माध्यमों में इनकी पहचान और मात्रा मापने के लिए एकसमान जांच पद्धति विकसित करना अब भी चुनौती बना है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : adobe stock images
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विस्तार
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सुबह की चाय में चीनी हो, खाने में नमक या फिर सांस के साथ शरीर में जाने वाली हवा, प्लास्टिक के बेहद छोटे कणों (माइक्रोप्लास्टिक) के संपर्क में आने की आशंका कई माध्यमों से है। ये कण इतने छोटे होते हैं कि सामान्य आंखों से दिखाई नहीं देते। वैज्ञानिक शोध में नमक-चीनी से लेकर इंसानी खून और फेफड़ों तक में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी सामने आई है। हालांकि, अलग-अलग माध्यमों में इनकी पहचान और मात्रा मापने के लिए एकसमान जांच पद्धति विकसित करना अब भी चुनौती बना है। इसे दूर करने के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से प्रगति रिपोर्ट मांगी है। 

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इन्हें तैयार करने, मानकीकरण और प्रयोगशालाओं में सत्यापन की प्रक्रिया में करीब 12 महीने लगने का अनुमान है। शुक्रवार को न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की पीठ ने नमक-चीनी के ब्रांडों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी और इंसानी खून में इसकी पहचान से जुड़े मामलों की सुनवाई की। सीपीसीबी ने 13 अक्तूबर को अपनी प्रगति रिपोर्ट दाखिल की थी। 

एक मानक है लेकिन हर माध्यम की जांच का तरीका नहीं 
सुनवाई में सीपीसीबी ने 13 अक्तूबर, 2026 की प्रगति रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय मानक आईएस 18998:2025 पर्यावरण में माइक्रोप्लास्टिक के विश्लेषण के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत देता है, लेकिन पानी, मिट्टी, अवसाद, हवा, कीचड़ और जैविक नमूनों की जांच के लिए माध्यम के अनुसार विस्तृत प्रक्रियाएं निर्धारित नहीं करता। यही वजह है कि अलग-अलग नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक की पहचान और विश्लेषण के लिए स्पष्ट पद्धतियां विकसित करने की जरूरत है।
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मिट्टी और हवा की जांच की जिम्मेदारी अलग-अलग संस्थानों को
सीपीसीबी की रिपोर्ट के मुताबिक, मीठे पानी और मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक की जांच की पद्धति विकसित करने के लिए सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सीआईपीईटी) ने सहमति दी है। समुद्री जल, तटीय अवसाद, कीचड़ और जैविक नमूनों के लिए नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट (एनसीएससीएम) काम करेगा। वहीं, हवा के नमूनों की जांच की पद्धति विकसित करने की जिम्मेदारी सीएसआईआर-नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट को दी जानी है।

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