2 से 18 आयु वर्ग के बच्चों पर कोवाक्सिन कोविड-19 वैक्सीन के द्वितीय/तृतीय चरण के क्लीनिकल ट्रायल पर रोक लगाने की मांग को लेकर उच्च न्यायालय में पुन: याचिका दायर की गई है। तर्क रखा गया है कि जून में ट्रायल शुरू हो गए हैं। बच्चों के हित में इन पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए। याची ने मई में ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) द्वारा बच्चों पर वैक्सीन का ट्रायल करने के लिए भारत बायोटेक को दी गई अनुमति को चुनौती दी है। याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई संभव है।
याचिकाकर्ता संजीव कुमार ने तर्क रखा कि उनकी याचिका पर अदालत ने केंद्र और भारत बायोटेक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था और यह याचिका अभी लंबित है। अदालत ने उनकी याचिका पर सुनवाई 15 जुलाई तय की है, लेकिन जून से बच्चों पर ट्रायल शुरू हो गए हैं। उन्होंने कहा कि पहले अदालत ने 2 से 18 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों में कोवैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था, लेकिन यदि अब रोक नहीं लगाई गई तो ट्रायल पूरा हो जाएगा और उनकी याचिका पर सुनवाई का कोई औचित्य ही नहीं रह जाएगा।
13 मई को डीसीजीआई ने भारत बायोटेक और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा विकसित वैक्सीन के लिए अनुमति दी, जिसका इस्तेमाल 18 से कम उम्र के लोगों में फेज-2 और फेज-3 ट्रायल में किया जाएगा। भारत में शुरू होने वाला इस तरह का यह पहला ट्रायल है।
मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल व न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ ने डीसीजीआई के अलावा महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय को नोटिस जारी किया था। याची ने इस मंजूरी आदेश को प्रथम दृष्टया गैरकानूनी, मनमाने ढंग से और कानून और प्राकृतिक न्याय के तय सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए तर्क रखा कि ट्रायल के लिए कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छानुसार पेशकश करता है। इस मामले में बच्चे न तो कुछ समझ पा रहे हैं और न ही उन्हें इस मामले में जानकारी है। वे कुछ भी समझने में असमर्थ हैं।
उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति कुछ भी करने की पेशकश तभी कर सकता है जब वह उसके कृत्य के परिणामों को समझने में सक्षम हो। वर्तमान मामले में क्लीनिकल ट्रायल को नाबालिग पर किया जा रहा है वे ट्रायल की उचित भाषा व उचित तरीके को समझने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में क्लीनिकल ट्रायल को स्वेच्छा से मंजूरी नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ता ने कहा कि जो बच्चे ट्रायल का हिस्सा होंगे, वे स्वस्थ होंगे उनके माता-पिता ट्रायल के लिए सहमति नहीं दे सकते हैं। क्योंकि, इससे नाबालिगों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा। कुछ मुआवजे की उम्मीद में अपने बच्चों को स्वयंसेवक बनाने वाले माता-पिता को ज्वुनाईल जस्टिस एक्ट के तहत दंडित किया जाए। इसके अलावा संबंधित पक्षों को उन सभी 525 बच्चों का ब्योरा पेश करने का निर्देश दिया जाए, जिन्हें ट्रायल के लिए चुना गया है।