राजधानी में ड्रेनेज के मास्टर प्लान पर आईआईटी दिल्ली काम कर रहा है। अपनी ड्रेनेज मास्टर प्लान की अंतरिम रिपोर्ट में दिल्ली सरकार को आईआईटी ने जो सिफारिशें सौंपी हैं, उसमें बरसाती पानी सीवरेज सिस्टम में बहाने वालों पर जुर्माना लगाने की सिफारिश की है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मोहल्ले स्तर पर बरसाती पानी का सिस्टम सरकार बनाए या फिर हर परिवार अपने खर्च पर ग्राउंड वाटर रिचार्ज सिस्टम तैयार करे। इसके लिए जागरूकता फैलाई जाए।
आईआईटी दिल्ली ने सिफारिश में कहा है कि फाइनल रिपोर्ट आने तक दिशा में काम किया जाए, जो ड्रेनेज के फाइनल मास्टर प्लान में सहयोग करेगा। उन्होंने कहा है कि नालों की सफाई ठीक से हुई या नहीं, इसकी स्थानीय अधिसूचित व्यक्तियों से फीडबैक लिए जाएं। इसमें जहां शिकायत मिले, उसे गंभीरता से देखा जाए।
इसके अलावा यह भी कहा है कि नाला साफ करने के बाद सड़क पर छोड़ी गई गाद नालों में चली जाती है। इसके लिए जिस गली, सड़क या कॉलोनी से कितना कूड़ा निकला है, इसकी मैपिंग की जाए। इसके बाद कूड़ा कम करने के लिए कदम उठाए जाएं। इसी तरीके से हर नाले से निकलने वाली गाद का जीआईएस मैपिंग से हिसाब-किताब रखकर धीरे-धीरे कम करने की दिशा में काम हो।
सफाई का शेड्यूल तय हो
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- फोटो : अमर उजाला
सिफारिश के अनुसार, होटल, मार्केट या अन्य जगह जहां ठोस कूड़ा अधिक निकलता है, वहां से उठाने की व्यवस्था शुरू करें। कंस्ट्रक्शन एंड डेमोलुशन वेस्ट को उठाने वाली सरकारी एजेंसी सूचीबद्ध करें ताकि इधर-उधर कूड़ा ना फेंका जाए। वहीं ढके नालों की सफाई ठीक से नहीं हो पाती है। इसलिए जरूरी है कि आईआईटी दिल्ली की नाला नेटवर्किंग के हिसाब से जियो-स्पेटियल लिमिटेड जीआईएस मैपिंग करके सफाई का शेड्यूल तय हो।
जनता में प्रचार हो और सफाई एजेंसी को प्वाइंट दिए जाएं। जब तक ड्रेनेज के मास्टर प्लान की फाइनल रिपोर्ट तैयार नहीं होती, तब तक जो भी नाले बनाए जाएं, उसके प्रभाव व व्यवहारिकता का अध्ययन हो। इसका डिजाइन आईआईटी के पास भेजा जाए। पुराने नालों की अच्छी सफाई के लिए किसी एक एजेंसी के सुपुर्द किया जाए और नाले अतिक्रमण मुक्त करने के लिए विशेष अभियान चलाया जाए।
एलिवेटेड रोड और मेट्रो पिलर ने भी बढ़ाई है दिक्कत
आईआईटी दिल्ली की रिपोर्ट में कहा गया है कि बरसाती नालों पर किसी तरह के निर्माण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। अभी कई नालों में अलग-अलग सेवा से जुड़े पाइप और तार डाले हुए हैं। इसी तरह से कई जगह ड्रेन पर एलिवेटेड रोड और मेट्रो ट्रैक के पिलर बने हुए हैं। ऐसे किसी भी काम को स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए। जहां कहीं ऐसा हो गया है तो जल्द से जल्द उस नालों को क्षमता के हिसाब से रिस्टोर किया जाना चाहिए।
आधुनिक व्यवस्था से खोले जाएं सीवर जाम
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सीवर के मैनहोल खुले ना हों। सीवर जाम की वजह से ओवरफ्लो होकर बरसाती नालों में जाने से रोक लगाने के साथ ही दिल्ली जल बोर्ड को आधुनिक व्यवस्था से सीवर जाम खोलना चाहिए। हरियाणा व उप्र से आने वाले नालों में सिर्फ बरसाती पानी या सीवर के शोधित पानी को ही छूट हो। बरसाती नालों में अनधिकृत कॉलोनी के सीवर को अनुमति ना दी जाए। एसटीपी या सीवर इंटरसेप्टर में शोधित करने के बाद ही इसे नाले में छोड़ा जाए।
फाइनल रिपोर्ट के लिए करना होगा इंतजार
दिल्ली सरकार को ड्रेनेज के मास्टर प्लान को लेकर अभी दिसंबर तक इंतजार करना पड़ेगा। आईआईटी दिल्ली ने अभी सिर्फ अंतरिम रिपोर्ट दी है, जिसके हिसाब से बरसात में जलभराव में कमी लाने के कुछ उपाय एमसीडी, पीडब्ल्यूडी व अन्य एजेंसियों को करने होंगे। फाइनल रिपोर्ट के लिए आईआईटी दिल्ली को अभी कुछ एजेंसियों से डाटा का इंतजार है। यह खुलासा पिछले दिनों दिल्ली सरकार में हुई एक बैठक में हुआ है, जिसमें कहा गया है कि इस साल के अंत तक ही रिपोर्ट फाइनल हो जाएगी। राजधानी में करीब पांच हजार नाले हैं, जिन्हें एकसाथ जोड़कर मास्टर प्लान तैयार किया जा रहा है।
शीला सरकार में नियुक्त हुए थे सलाहकार
राजधानी दिल्ली हर साल मानसून के सीजन में सड़कों पर जलभराव को लेकर चर्चा में रहता है। नालों का नेटवर्क मास्टर प्लान 1981 में बना था, उस समय आबादी 50 लाख से भी कम थी। अब आदी पौने दो करोड़ पहुंच गई है। बहुमंजिला मकान बढ़े हैं, जिससे नाले ओवरफ्लो हो रहे हैं। उस हिसाब से कई एजेंसियों ने नाले बनाएं लेकिन आपस में एकरूपता नहीं होने के कारण दिक्कतें बढ़ी हैं। उसी को ध्यान में रखकर मुख्यमंत्री रहते शीला दीक्षित सरकार में आईआईटी दिल्ली को ड्रेनेज के मास्टर प्लान को लेकर सलाहकर नियुक्त किया गया था। नोडल एजेंसी के तौर पर सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग काम कर रहा है।