निजी स्कूलों में नर्सरी में दाखिले की रेस में पड़ोस का मानक अभिभावकों के लिए चुनौती साबित हो रहा है। स्कूलों में दाखिले के लिए दूरी एक अहम मानक है। अभिभावक इसके फेर में ही उलझ गए हैं। दरअसल कई स्कूलों का घर से दूरी (पड़ोस) मापने का तरीका अलग-अलग है। कुछ स्कूल गूगल मैप, सैटेलाइट मैप से, कुछ बस रूट और कुछ कॉलोनी के आधार पर दूरी माप रहे हैं। इस कारण स्कूल से नजदीक रहने के बावजूद अभिभावक दूरी के अधिकतम अंकों से वंचित हो रहे हैं।
निजी स्कूलों ने दाखिला मानकों में पड़ोस (नेबरहुड) के लिए 20 से 80 तक अंक तय किए हैं। कुछ स्कूलों ने पड़ोस के लिए कॉलोनी का नाम मानक रखा है। यानी पड़ोस के मानक में स्कूल ने जो कॉलोनी शामिल की है, उसी के आधार पर बच्चे को अंक मिलेंगे। कई कॉलोनियां स्कूलों की सूची में नहीं हैं। अभिभावकों की परेशानी यह है कि स्कूल के पास रहने के बावजूद उनकी कॉलोनी मानक में शामिल नहीं है।
कुछ कॉलोनी ऐसी हैं, जहां स्कूल से घर की दूरी कम है, लेकिन वहां बस रूट नहीं है। इससे दूरी का दायरा अधिक हो रहा है। ऐसे में अभिभावक अंकों से वंचित हो रहे हैं। कुछ स्कूल गूगल मैप से भी पड़ोस को माप रहे हैं। गूगल की माप में कुछ इलाकों की दूरी अधिक बताई जा रही है, जबकि वह स्कूल के पास है। अभिभावकों का कहना है कि सड़क से दूरी और गूगल मैप से दूरी अलग-अलग आती है।
एडमिशन नर्सरी डॉट कॉम प्रमुख सुमित वोहरा का कहना है कुछ स्कूलों ने ऐसी कॉलोनी को मानक में शामिल किया है, जहां से चुनिंदा अभिभावकों को ही दाखिले का लाभ मिल सकता है। पड़ोस के अंक के लिए पारदर्शिता होनी चाहिए। शिक्षा निदेशालय को चाहिए कि अभिभावकों की परेशानी को समझते हुए स्थिति को स्पष्ट करे। वहीं, आधार कार्ड को लेकर भी शिक्षा निदेशालय ने अब तक स्थिति स्पष्ट नहीं की है। स्कूल बच्चे का आधार कार्ड मांग रहे हैं, जबकि वह जरूरी नहीं है।