-2015 में पंचायत द्वारा महिला को दिए गए तलाक को हाईकोर्ट ने किया खारिज
-कहा, हिंदू विवाह अधिनियम के तहत कस्टमरी डायवोर्स को वैध ठहराना है तो साबित करें
-मामला झज्जर जिले की महिला से जुड़ा, 2015 में पंचायत में तलाक हुआ था मंजूर
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। जाट समुदाय में पंचायती तलाक या खाप पंचायत द्वारा दिया गया तलाक कानूनी तलाक नहीं माना जाएगा। जब तक कि यह साबित न हो जाए कि यह रिवाज प्राचीन काल से लगातार और बिना रुकावट के चला आ रहा है। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विपिन सांघी की खंडपीठ ने एक महिला की याचिका खारिज करते हुए कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम में तलाक के लिए सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि हमारे समुदाय में पंचायत तलाक देते हैं। कस्टमरी डाइवोर्स को वैध ठहराने के लिए पुख्ता सबूत चाहिए कि वह रिवाज निश्चित, प्राचीन, निरंतर और समुदाय के सभी लोगों द्वारा बाध्यकारी रूप से मान्य है।
मामला हरियाणा के झज्जर की एक जाट महिला का था। उसने 2010 में शादी की थी। 2015 में दोनों पक्षों की पंचायतें बैठीं और पंचायत ने तलाक दे दिया। पंचायत ने लिखित में भी फैसला दिया कि “अब दोनों पक्ष एक-दूसरे पर कोई दावा नहीं रखेंगे”। इसके बाद महिला ने दूसरी शादी कर ली और बच्चा भी हुआ। 2019 में पहला पति कोर्ट पहुंचा और दावा किया कि पंचायती तलाक कानूनी नहीं है, इसलिए उसकी पत्नी अभी भी उसकी वैध पत्नी है और दूसरी शादी अवैध है। ट्रायल कोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला दिया। महिला ने हाईकोर्ट में अपील की और कहा कि जाट समुदाय में सदियों से पंचायती तलाक मान्य है, इसलिए उसका दूसरा विवाह वैध है। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि पंचायत का लिखित फैसला 2015 का है, उससे पहले का कोई लिखित या ठोस सबूत नहीं। कोर्ट ने अंत में कहा, जब तक हिंदू विवाह अधिनियम के तहत कोर्ट से डिक्री या वैध कस्टम साबित न हो, विवाह बना रहता है। इसलिए महिला का दूसरा विवाह अवैध है और उससे हुआ बच्चा वैध नहीं माना जाएगा।