मेरा वतन हिंदुस्तान है, लेकिन रिहायश पाकिस्तान में है। लईक चाचा की आवाज यह कहते हुए भारी हो गई। पाकिस्तान जाने के फैसले का गम उन्हें आज भी है। ट्रेड फेयर में कारोबारियों को फिक्र कारोबार की है, लेकिन पत्थर का सामान लेकर पहुंचे लईक चाचा पुश्तैनी शहर रामपुर पहुंचने को बेचैन हैं।
उनकी कोशिश बीस दिवसीय वीजा का समय बढ़वाने की है। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से स्नातक 90 वर्षीय लईक अहमद रामपुर के जमीदार खानदान से हैं। विभाजन के समय पूरा परिवार यहीं रुक गया, लेकिन भाई के साथ वह पाकिस्तान चले गए। आज सबसे ज्यादा गम उन्हें अपने इसी फैसले का है।
उनको हमेशा रामपुर में गुजारे दिन याद आते हैं। ट्रेड फेयर में शिरकत करने का उनका मकसद कारोबार के साथ दोस्तों-परिजनों से मुलाकात करना भी होता है। बकौल लईक, ‘बुजुर्गियत में बचपन की बेहद याद आती है। दोस्तों-परिजनों के साथ गुजारे दिन, गलियां, खेत-खलिहान, अब्बा-अम्मी की झिड़कियां और प्यार। अकेले में रोने का दिल करता है।
अपने बच्चों को भी रामपुर लाता रहता हूं। पूरी दुनिया घूमा है। लोग हमें बाबा-ए-नुमाइश कहते हैं। फिर भी साल के सबसे अच्छे दिन यही होते हैं।’ लईक की दिली ख्वाहिश है कि दोनों देशों के बीच अमन-चैन हो। यूरोप-अमेरिका की तरह कहीं भी आने-जाने की आजादी हो।
पाकिस्तान पवेलियन में खासी भीड़
कारोबारी दिनों में शुक्रवार को खासी भीड़ दिखी। बगल के चंडीगढ़, गोवा और उत्तराखंड पवेलियन में चंद दर्शक थे, लेकिन पाकिस्तान पवेलियन में जमकर खरीदारी हुई। ज्यादा भीड़ कपड़ों की दुकानों पर रही।
पवेलियन में पाकिस्तानी मसाले, गरम पेय और स्टोन की कारीगरी के साथ दूसरे सजावट की सामनों के स्टॉल हैं। कारोबारी अहमद हुसैन ने कहा कि अभी शुरुआती दिन है। इस बार जिस तरह रेस्पाॅंन्स मिल रहा है, लगता है कि मेला अच्छा रहेगा।
ओनेक्स स्टोन का फर्नीचर और सजावटी सामान
पाकिस्तान पवेलियन में ओनेक्स स्टोन का फूलदान से रसोई के सामान तक का हर तरह का सामान मौजूद है। इसकी कीमत पचास रुपये से पांच लाख रुपये के बीच है।
डाइनिंग टेबल करीब 1.50 लाख रुपये में है तो बड़ा फूलदान पांच लाख का। क्रॉकरी तो बेहद मजबूत है। मजबूती के सवाल पर याकूब अहमद एक प्लेट पर दूसरी प्लेट जोर से फेंकते हैं, लेकिन इस पर निशान तक नहीं आता।
ताहिर आलम का तुर्कमान गेट से लगाव
हाजी ताहिर आलम की कहानी भी जुदा नहीं है। विभाजन के समय ताहिर के अब्बू कराची चले गए। चार साल बाद उनकी पैदाइश वहीं हुई, लेकिन परिवार का हिंदुस्तान से लगाव बना रहा।
ताहिर बताते हैं, ‘1987 में पहली आना हुआ था। ढुकनान गली में दादा के दोस्त मिले। नाम पूछा। फिर बोले, देखो, पूरी गली तुम्हारे दादा की थी। बहुत समझाया था, लेकिन वह नहीं रुका। यहां इतनी संपत्ति थी, फिर भी वहां जाकर दर-दर ठोकरें खानी पड़ी।’ ताहिर के मुताबिक, अब्बू ने रुमाल बेचने से काम शुरू किया था।
आज कराची में रेडीमेट गारमेंट के एक्सपोर्ट का कारोबार है, लेकिन शुरुआती दिनों में बड़ी ठोकरें खाई थीं। हम सबकी इच्छा यही है कि भारत-पाकिस्तान में अमन हो। दोनों देश के लोगों को दोनों तरफ आने-जाने का मौका मिले।