गाजियाबाद में मोबाइल छीनने से नाराज तीन मासूम बेटियों की आत्महत्या ने पूरे एनसीआर को भीतर तक हिला दिया है। यह सिर्फ एक दुखद घटना नहीं, बल्कि उन अनसुने सवालों की चीख है, जिनसे आज हर घर के बच्चे जूझ रहे हैं। न्यूक्लियर फैमिली और भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता का समय कम होता जा रहा है, जबकि बच्चों की दुनिया मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स तक सिमटती जा रही है।
ये न करें...
मोबाइल से दूरी, मैदान है जरूरी
बढ़ते स्क्रीन टाइम ने बच्चों के सोचने और समझने शक्ति को प्रभावित किया है। खेल प्रशिक्षकों का मानना है कि बच्चों का स्क्रीन टाइम घटाने और उन्हें सोशल बनाने का सबसे बेहतर माध्यम स्पोर्ट्स है। इससे जहां उनके भीतर प्रतिस्पर्धा की भावना जागृत होगी वहीं स्क्रीन टाइम भी कम होगा।इहबास के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. ओम प्रकाश ने कहा कि बच्चे जब नियमित रूप से किसी खेल से जुड़ते हैं तो डोपामिन और एंडॉर्फिन जैसे वही हार्मोन मिलते हैं जो मोबाइल गेम्स से मिलते हैं लेकिन बिना किसी नुकसान के।
क्रिकेट, फुटबॉल, बैडमिंटन, कबड्डी या एथलेटिक्स जैसे खेल बच्चों को न केवल व्यस्त रखते हैं, बल्कि टीमवर्क, अनुशासन और आत्मविश्वास भी सिखाते हैं। खेल अकादमी में और पार्क में बच्चों के साथ खेलने वाले बच्चों के परिजनों का भी मानना है कि खेल से जुड़ने के बाद बच्चों का मोबाइल टाइम अपने आप 30–40 प्रतिशत तक घट गया है। बच्चे देर रात तक ऑनलाइन रहने की बजाय थककर समय पर सोने लगे हैं।