ऑनलाइन गेमिंग के असर से गाजियाबाद में तीन नाबालिग बच्चियों की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस घटना से न सिर्फ आम लोग, बल्कि देश के शीर्ष मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी सकते में हैं। दिल्ली एम्स के वरिष्ठ डॉक्टरों का कहना है कि अगर कोई ऑनलाइन गेम बच्चों को आत्मघाती कदम तक ले जा रहा है, तो यह बेहद गंभीर और खतरनाक संकेत है। विशेषज्ञों ने चेताया, बच्चों का मानसिक ढांचा परिपक्व नहीं होता। ऐसे में टास्क आधारित, मानसिक दबाव पैदा करने वाले या भावनात्मक रूप से फंसाने वाले गेम्स उनके लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।
अभिभावक बच्चे से करें संवाद फोन व व्यवहार पर रखें नजर
दिल्ली एम्स के डॉ. राजेश सागर ने कहा कि अभिभावकों को बच्चों से प्रतिदिन संवाद और उनके फोन या कंप्यूटर की निगरानी बहुत जरूरी है। बच्चे किस तरह के इंटरनेट सर्चिंग कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर उनका किस तरह से रुझान और क्या पोस्ट हैं? कौन से गेम वह खेलते हैं और उनके व्यवहार में क्या बदलाव आ रहा है? बच्चा कम खा रहा है, नींद कम आ रही है, चिड़चिड़ा हो रहा है या फिर एकदम शांत हैं, तो ऐसे व्यवहार में तत्काल चिकित्सा मदद लेनी चाहिए।
कैसे पता चलेगा कि गेमिंग की लत है, इसके लक्षण क्या हैं?
बहुत से लोग इंटरनेट पर या अलग गेम खेलते हैं, हर किसी को लत नहीं लगती। लेकिन हमेशा खेलने की जब जरूरत महसूस होती है? जब खेल नहीं रहे होते हैं, तब भी खेलने की तीव्र इच्छा होती है, तो यह गंभीर समस्या है, जिसके लिए पेशेवर मदद की जरूरत होती है।
सबसे बड़े गेमिंग बाजारों में शुमार भारत
भारत दुनिया के सबसे बड़े गेमिंग बाजारों में से एक है। अरबों गेम डाउनलोड और करोड़ों मोबाइल गेमर्स हर दिन खेलते हैं। नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) की यूपीआई से भुगतान पर आधारित रिपोर्ट बताती है कि अप्रैल-जुलाई 2025 के दौरान ऑनलाइन गेम पर 41,000 करोड़ रुपये खर्च किए, जो कि दवा दुकानों और फार्मेसियों में खर्च की गई राशि के लगभग बराबर है। आंकड़े बताते हैं कि कोरोना के समय लॉकडाउन के बाद गेमिंग समय में तेजी से वृद्धि हुई और 21% से अधिक समय बच्चों ने ऑनलाइन गेम में बिताया। बड़ी संख्या में युवा गेम के लती बनकर पढ़ाई, नींद और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों से कटते जाते हैं।