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Online Gaming: जानलेवा है ऑनलाइन गेमिंग की लत, बच्चों से दूर हो रहे परिवार; घातक कंटेंट के लिए कौन जिम्मेदार?

Thu, 05 Feb 2026 04:07 AM IST
दुष्यंत शर्मा परीक्षित निर्भय, दिल्ली

सार

गाजियाबाद में ऑनलाइन गेम की लत की वजह से तीन बच्चियों के जान देने की घटना ने न सिर्फ पूरे देश को झकझोर दिया है, बल्कि ऑनलाइन गेम्स  कितने खतरनाक और आत्मघाती साबित हो सकते हैं इसका साफ संकेत भी दे दिया है। विशेषज्ञों ने भी चेताया, जानलेवा टास्क देने वाले ऐसे गेम तत्काल बंद किए जाने चाहिए। 
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online game - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
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ऑनलाइन गेमिंग के असर से गाजियाबाद में तीन नाबालिग बच्चियों की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस घटना से न सिर्फ आम लोग, बल्कि देश के शीर्ष मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी सकते में हैं। दिल्ली एम्स के वरिष्ठ डॉक्टरों का कहना है कि अगर कोई ऑनलाइन गेम  बच्चों को आत्मघाती कदम तक ले जा रहा है, तो यह बेहद गंभीर और खतरनाक संकेत है। विशेषज्ञों ने चेताया, बच्चों का मानसिक ढांचा परिपक्व नहीं  होता। ऐसे में टास्क आधारित, मानसिक दबाव पैदा करने वाले या भावनात्मक रूप से फंसाने वाले गेम्स उनके लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।

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नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के मनोरोग विभाग के डॉ. राजेश सागर ने कहा कि ऑनलाइन गेम्स और स्क्रीन की वजह  से बच्चों में कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं हो रही हैं। उनके व्यवहार में बदलाव आ रहा है और ये स्थिति तेजी से गंभीर हो रही है, लेकिन जानलेवा  टास्क वाले गेम्स की वजह से बच्चियों की मौत की घटना बेहद गंभीर है। अगर जांच में इसकी पुष्टि हुई है तो तत्काल ऐसे गेम्स पर प्रतिबंध लगना  चाहिए। कुछ समय पहले ब्लू व्हेल्स जैसे गेम्स की वजह से देश के अलग-अलग हिस्सों में घटनाएं हुई थीं।

डॉ. सागर ने कहा कि हम यह मानने को तैयार नहीं हैं कि तीन बच्चियां किसी गहरे मानसिक दबाव के बिना ऐसा कदम उठा सकती हैं। अगर कोई  गेम उन्हें डर, अपराधबोध या तथाकथित अंतिम टास्क की ओर धकेल रहा था, तो यह बेहद खतरनाक है। वहीं बंगलूरू स्थित निम्हांस के मनोरोग  विशेषज्ञ डॉ. कार्तिकेय ने भी कहा कि यदि कोई गेम बच्चों को जानलेवा टास्क दे रहा था, तो ऐसे गेम पर रोक क्यों नहीं लगी? और किसकी जिम्मेदारी है कि बच्चों तक ऐसा कंटेंट नहीं पहुंचे? 
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सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं

  • विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा को लेकर बड़ी चेतावनी है
  • डॉ. कार्तिकेय ने कहा कि ऑनलाइन गेम खेलने में अधिक समय बिताने से आईजीडी (इंट्राइग्रेशनल गेमिंग डिसऑर्डर) का खतरा काफी बढ़ जाता है। आईजीडी से स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ती हैं
  • बच्चों, अभिभावकों, संस्थानों और संबंधित अधिकारियों के बीच अत्यधिक गेमिंग के स्वास्थ्य परिणामों के बारे में जागरूकता बढ़ाना अहम है

अभिभावक बच्चे से करें संवाद फोन व व्यवहार पर रखें नजर 
दिल्ली एम्स के डॉ. राजेश सागर ने कहा कि अभिभावकों को बच्चों से प्रतिदिन संवाद और उनके फोन या कंप्यूटर की निगरानी बहुत जरूरी है। बच्चे किस तरह के इंटरनेट सर्चिंग कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर उनका किस तरह से रुझान और क्या पोस्ट हैं? कौन से गेम वह खेलते हैं और उनके व्यवहार में क्या बदलाव आ रहा है? बच्चा कम खा रहा है, नींद कम आ रही है, चिड़चिड़ा हो रहा है या फिर एकदम शांत हैं, तो ऐसे व्यवहार में तत्काल चिकित्सा मदद लेनी चाहिए। 

  • खासकर वे गेम जो बच्चों को लगातार टास्क देते हैं, उन्हें लती बनाकर परिवार से दूर करते हैं, तो ऐसे मामलों में मानसिक सेहत पर असर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

कैसे पता चलेगा कि गेमिंग की लत है, इसके लक्षण क्या हैं?
बहुत से लोग इंटरनेट पर या अलग गेम खेलते हैं, हर किसी को लत नहीं लगती। लेकिन हमेशा खेलने की जब जरूरत महसूस होती है? जब खेल नहीं रहे होते हैं, तब भी खेलने की तीव्र इच्छा होती है, तो यह गंभीर समस्या है, जिसके लिए पेशेवर मदद की जरूरत होती है।

  • जब आप अन्य कार्यों या जिम्मेदारियों की तुलना में गेम को महत्व देते हैं। गेम खेलने की लत आपकी व्यक्तिगत, सामाजिक, व्यावसायिक/शैक्षिक गतिविधियों में बाधा डाल रही है?
  • आपको लगता है कि और खेलें। आप खेलना कम या बंद करना चाहते हैं, पर ऐसा नहीं कर पाते। आप और अधिक दिलचस्प गेम ढूंढते हैं।
  • जब आप गेम खेलने में असमर्थ होते हैं या तो बेचैनी, उदासी, चिंता, चिड़चिड़ापन या अन्य नकारात्मक भावना महसूस होती है।
  • नींद की कमी, आपसी संबंधों में समस्याएं, समय पर काम न कर पाना जैसे नकारात्मक असर जानने के बाद भी गेम खेलने पर नियंत्रण नहीं रख पाते। 

सबसे बड़े गेमिंग बाजारों में शुमार भारत
भारत दुनिया के सबसे बड़े गेमिंग बाजारों में से एक है। अरबों गेम डाउनलोड और करोड़ों मोबाइल गेमर्स हर दिन खेलते हैं। नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) की यूपीआई से भुगतान पर आधारित रिपोर्ट बताती है कि अप्रैल-जुलाई 2025 के दौरान ऑनलाइन गेम पर 41,000 करोड़ रुपये खर्च किए, जो कि दवा दुकानों और फार्मेसियों में खर्च की गई राशि के लगभग बराबर है। आंकड़े बताते हैं कि कोरोना के समय लॉकडाउन के बाद गेमिंग समय में तेजी से वृद्धि हुई और 21% से अधिक समय बच्चों ने ऑनलाइन गेम में बिताया। बड़ी संख्या में युवा गेम के लती बनकर पढ़ाई, नींद और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों से कटते जाते हैं।

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