नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक स्कूल टीचर द्वारा छात्रा के यौन उत्पीड़न में उसकी पांच साल की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे किसी भी ऐसे व्यवहार के बारे में खुलकर बोल सकें, जिससे उन्हें डर या असुरक्षा महसूस न हो। न्यायमूर्ति मधु जैन ने बुधवार को फैसले में कहा कि बच्चा शिक्षक पर भरोसा और विश्वास रखता है। शिक्षक-छात्र संबंध में यह विश्वास पवित्र है और इसके साथ नाबालिग की रक्षा करने का दायित्व जुड़ा होता है, न कि उसका दुरुपयोग या विश्वास तोड़ना।
अदालत ने टिप्पणी की, ऐसे पद का दुरुपयोग, खासकर तब जब पीड़िता की उम्र शिक्षक की अपनी बेटी के लगभग बराबर हो, बेहद गंभीर चिंता का विषय है। इसे सिर्फ अनुशासन या शिष्टाचार का उल्लंघन मानकर नहीं देखा जा सकता।
यह है मामला
ड्रॉइंग टीचर को ट्रायल कोर्ट ने स्कूल परिसर में कई मौकों पर छात्रा के साथ अनुचित व्यवहार करने का दोषी ठहराया था। अगस्त 2016 में उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। ट्रायल कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के तहत एग्रेवेटेड सेक्सुअल असॉल्ट तथा आईपीसी की महिला की लज्जा भंग करने और यौन उत्पीड़न संबंधी धाराओं में उसे पांच साल की सजा और दो हजार रुपये जुर्माना सुनाया था।