नोएडा प्राधिकरण के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह के प्रमोशन समेत अनियमितता मामले की प्रशासनिक जांच लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के प्रमुख सचिव नरेंद्र भूषण को मिली है। इससे पहले बतौर ग्रेनो प्राधिकरण के सीईओ नरेंद्र भूषण ही इस मामले की जांच कर रहे थे, लेकिन उनके तबादले के बाद यह जांच अधूरी रह गई थी। पहली बार यह जांच औद्योगिक विकास विभाग से बाहर गई है।
सूत्रों का कहना है कि नरेंद्र भूषण के तबादले के बाद ग्रेनो प्राधिकरण ने यादव सिंह की फाइल लौटा दी थी, क्योंकि इसे लेकर कोई निर्देश नहीं मिले थे। ऐसे में जांच का काम थम गया। अब इस जांच को और आगे बढ़ाने का फैसला शासन ने किया है। जांच के दौरान यादव सिंह के प्रमोशन समेत कई अनियमितताओं की परतें खोली जाएंगी। हालांकि, यादव सिंह का कार्यकाल खत्म हो चुका है।
सीबीआई की गिरफ्तारी के समय ही यादव सिंह को निलंबित कर दिया गया था। बाद में लंबे समय तक यादव सिंह को जेल भी जाना पड़ा। अब एक बार फिर शुरू होने वाली जांच से यादव सिंह की मुश्किलें बढ़ेंगी। यादव सिंह पर टेंडर आदि घोटाले के आरोप लगे थे। इसमें नकली कंपनियां बनाकर फायदा पहुंचाने का आरोप लगा था।
यादव सिंह ने 1980 में जूनियर इंजीनियर के पद पर ज्वाइन किया था। इसके बाद नौ वर्ष में उन्हें असिस्टेंट इंजीनियर बना दिया गया। असिस्टेंट इंजीनियर से प्रोजेक्ट इंजीनियर बनाने में भी इसी तरह की जल्दबाजी की गई। वे 1995 में प्रोजेक्ट इंजीनियर बन गए। एई और पीई की तरह ही सीनियर प्रोजेक्ट इंजीनियर दो साल (1997) में बना दिया गया, जबकि आठ साल का अनुभव होना चाहिए।
इसके बाद चीफ इंजीनियर बनाने में भी जल्दबाजी की गई। आठ साल की जगह पांच साल में चीफ इंजीनियर बन गए। उनके लिए इंजीनियर इन चीफ का पद सृजित किया गया और तीनों प्राधिकरणों के इंजीनियरिंग का चार्ज दे दिया गया। इन सभी पदोन्नतियों में तय समय से पहले पदोन्नति पर सवाल उठाए गए हैं।