बच्चियों को पढ़ाती थी सुदीक्षा
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उसके पैसे से ही पिता ने गांव से बाहर दूसरे घर का निर्माण कराया है। वहीं, पर पिता की दुकान है। सुदीक्षा घर और अपने भाई-बहन की पढ़ाई का खर्च उठाने में भी मदद कर रही थी। सुदीक्षा की मां ने बताया कि दूसरों को बेटा सहारा देता है, लेकिन मेरी बेटी, मेरा बेटा थी। उसने मुझे सहारा दिया था। अब मेरे पास कोई सहारा नहीं है।