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Noida News: वो हर दिन दोहरी जिंदगी जीती है, एक प्रोफेशनल, एक पर्सनल, आखिर वो मां है

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मदर्स डे पर विशेष
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उसके दिन की शुरुआत बच्चों से और अंत होता है ऑफिस की रिपोर्ट से
- एक हाथ से चलाती है लैपटॉप, दूसरे से बच्चे को देती है दुलार
-कभी बॉस की टीम लीडर तो कभी बच्चों की सुपरहीरो-वोह तो हर रोल में परफेक्ट है



ज्योति सिंह
ग्रेटर नोएडा। सुबह ऑफिस की मीटिंग, दोपहर में बच्चे की ऑनलाइन क्लास,और रात में घर का खाना, यह किसी सुपरवुमन की कहानी नहीं, बल्कि हमारे आसपास की हर उस मां की हकीकत है जो नौकरी के साथ-साथ अपनी मां की भूमिका भी पूरी निष्ठा के साथ निभा रही हैं। आज की कामकाजी मां सिर्फ घर और ऑफिस नहीं, बल्कि खुद के सपनों और परिवार की जरूरतों के बीच एक संतुलन बना रही हैं। मदर्स डे के इस खास दिन पर पेश ऐसी ही सुपरवुमन के कुछ सुपर-दिलचस्प किस्से।


-काम से प्यार है तो सब आसान है
25 सालों से बतौर शिक्षक कार्यरत रश्मि त्रिपाठी दो बेटों की मां हैं। वो कहती हैं कि एक शिक्षक के साथ-साथ मां होना भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। सुबह के नाश्ते के बाद स्कूल, फिर स्कूल से घर और बच्चों के साथ रात के खाने की तैयारी करना। लोग अक्सर पूछते हैं कि दोनों के बीच में संतुलन बनाना कितना कठिन है। मेरा जवाब होता है कि अगर अपने काम से प्यार है तो सब आसान है।
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-हर वर्किंग वुमन एक फाइटर है
सरन्या पांडेय एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और उनकी एक 3 साल की बेटी है। वह कहती हैं कि मां बनना एक खूबसूरत अहसास और अनुभव है, लेकिन जब आप एक वर्किंग वुमन होती हैं तो ये सफर आसान नहीं होता। मेरी जिंदगी उस दिन से बदल गई जब मेरी बेटी ने जन्म लिया। मीटिंग के बीच बच्ची की रोने की आवाज, नींद की कमी और हर वक्त का तनाव। धीरे-धीरे मैंने खुद को संभालना सीखा, एक संतुलन बनाया, काम बांटे और छोटी-छोटी खुशियों को सेलिब्रेट करना शुरु किया। मैं मानती हूं कि हर वर्किंग वुमन एक फाइटर है।

-बच्चों की मुस्कुराहट देखकर भूल जाती हूं थकान
केंद्रीय विहार सोसायटी में रहने वाली जागृति अपने दो बेटों की सिंगल पैरेंट हैं। वह कहती हैं कि अकेले दो बच्चों को संभालना इतना आसान नही हैं। पहले नौकरी करती थी, लेकिन इस साल जनवरी में मेरी नौकरी चली गई। ऐसे में बच्चों की अच्छी परवरिश, पढ़ाई और घर की जिम्मेदारी इन सबका बोझ कंधों पर था। मैंने क्लाउड किचन और होम ब्यूटी पार्लर का काम शुरु किया। सब कुछ एक साथ लेकर चलना बहुत कठिन हैं, लेकिन जब अपने बच्चों को पढ़ते, खेलते और मुस्कुराते देखती हूं तो लगता है सब कुछ आसान है।
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-संघर्षों ने मुझे और मजबूत बनाया है
सेक्टर पी-3 में रहने वाली पायल गुप्ता अमेरिका की एक कंपनी में फाइनेंस डाइरेक्टर के साथ-साथ एक बेटे की सिंगल पैरेंट हैं। वह बताती हैं कि घर-परिवार और नौकरी इन सब में संतुलन बनाना इतना आसान नहीं होता। सुबह 4 बजे उठती हूं। खाना बनाने के साथ घर के सारे काम करती हूं। फिर, बेटे को स्कूल भेजकर खुद ऑफिस जाती हूं। लंच ब्रेक में अपने बेटे के लिए प्रश्न पत्र बनाती हूं। फिर शाम को घर लौटकर सारा काम निपटाने के बाद उसके चैप्टर्स की रिकॉर्डिंग करती हूं। ताकि वो रिवीजन कर सके। फिर रात को उसके साथ बैठकर पढ़ाई करवाती हूं। लेकिन ये भाग दौड़ और ये संघर्ष मुझे और मजबूत बनाता है।
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