फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'संत सरिता' सत्र: आचार्य प्रशांत ने कहा- जीत-हार से पहचान न जोड़ें, सफर में बने रहना ही असली मंजिल

Tue, 13 Oct 2026 12:19 AM IST
Digvijay Singh अमर उजाला नेटवर्क, ग्रेटर नोएडा

सार

पदक जीतने के बाद भी खिलाड़ी दबाव और हार के डर से क्यों जूझते हैं. सफलता हासिल करने के बाद जिंदगी में संतुलन कैसे बनाए रखें. इन्हीं सवालों पर रविवार को एशियाई खेलों में सॉफ्ट टेनिस का कांस्य पदक जीतने वाले जय मीणा और कॉमनवेल्थ पावरलिफ्टिंग के पदक विजेता उत्तम सिंह रावत ने आचार्य प्रशांत से बातचीत की।
विज्ञापन
'संत सरिता' सत्र - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

पदक जीतने के बाद भी खिलाड़ी दबाव और हार के डर से क्यों जूझते हैं. सफलता हासिल करने के बाद जिंदगी में संतुलन कैसे बनाए रखें. इन्हीं सवालों पर रविवार को एशियाई खेलों में सॉफ्ट टेनिस का कांस्य पदक जीतने वाले जय मीणा और कॉमनवेल्थ पावरलिफ्टिंग के पदक विजेता उत्तम सिंह रावत ने आचार्य प्रशांत से बातचीत की। आईआईएमटी लैडर बिजनेस फाउंडेशन में आयोजित ‘संत सरिता’ सत्र में आचार्य प्रशांत ने खिलाड़ियों को नतीजे की चिंता से आगे बढ़कर अपने खेल और प्रयास पर ध्यान देने की सलाह दी।

विज्ञापन


देवास के जय मीणा ने 23 सितंबर को आइची-नागोया एशियाई खेलों में पुरुष एकल सॉफ्ट टेनिस में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा। तीसरे एशियाड में भी उन्हें क्वार्टर फाइनल में हारने का दबाव सता रहा था। क्वार्टर फाइनल जीतकर कांस्य पदक पक्का होते ही उन्होंने पिता से कहा अब मैं खुद के लिए खेलूंगा। सेमीफाइनल में जापानी खिलाड़ी से हारने के बावजूद इस बार जय ने खुलकर मुकाबला किया।

जय की बात सुनकर आचार्य प्रशांत ने सवाल किया, मैं पूछूंगा प्रेशर था ही क्यों? उन्होंने सलाह दी गोल्ड का फाइनल वैसा ही खेलो जैसा ब्रॉन्ज का मैच खेला था और ब्रॉन्ज का मैच वैसा ही खेलो जैसा प्रैक्टिस में खेलते हो। उन्होंने कहा कि इंसान खेल के मैदान में भी वैसा ही होता है जैसा जिंदगी के मैदान में होता है। जय ने बताया कि बड़े मुकाबलों में होने वाली असुरक्षा के बारे में उन्होंने पहले किसी इंटरव्यू में भी खुलकर बात नहीं की थी। वह पिछले छह-सात वर्षों से आचार्य प्रशांत के वीडियो देखते हैं। जय के कोच सुदेश सांगते ने अपने संघर्ष का जिक्र करते हुए बताया कि राष्ट्रीय पदक जीतने के बाद जिस अखबार में उनकी तस्वीर छपती थी उसी अखबार को कभी उन्हें बस स्टैंड पर बेचना पड़ता था। उनकी अकादमी में 250 से 300 बच्चे मुफ्त प्रशिक्षण लेते हैं। आचार्य प्रशांत ने अधिक बच्चों के लिए नए कोर्ट बनवाने की बात कही।
विज्ञापन


43 वर्षीय उत्तम सिंह रावत गाजियाबाद की एक निजी कंपनी में क्षेत्रीय प्रबंधक हैं। नौकरी के साथ अभ्यास करते हुए उन्होंने कनाडा में कॉमनवेल्थ पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण और रजत पदक जीते। विदेशी धरती पर राष्ट्रगान सुनने का सपना पूरा होने के बाद अब उन्हें चिंता थी कि जिंदगी का संतुलन कैसे बनाए रखें। इस पर आचार्य प्रशांत ने कहा सेटल मत होइए। उन्होंने नई चुनौतियां लेने और दूसरों के लिए भी अवसर बनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा सफर में बने रहना ही मंजिल है।

तीन घंटे से अधिक चले कार्यक्रम के शुरुआती 96 मिनट में आचार्य प्रशांत ने बुल्ले शाह की काफी ‘बुल्ला की जाणा मैं कौण’ के माध्यम से इंसान की पहचान सुख-दुख और अहंकार पर बात की। आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र आचार्य प्रशांत ने कहा कि इंसान का सुख-दुख अक्सर परिवार, जाति, धर्म और परिस्थितियों से मिली पहचान से तय होता है। उन्होंने कहा सारी खुशी आत्मरक्षण की राहत मात्र है। उनके मुताबिक धर्म भी कई बार अहंकार को खत्म करने के बजाय उसका मजबूत कवच बन सकता है।

कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने भी अपने अनुभव साझा किए। आयुर्वेदिक चिकित्सक पूजा सक्सेना ने कहा कि अब उन्हें बाहरी प्रेरणा की जरूरत महसूस नहीं होती जबकि नोएडा की अकाउंटेंट विशाखा ने परिवार के विरोध के बावजूद पढ़ाई जारी रखने और नौकरी करने का अनुभव बताया। कार्यक्रम में जीत-हार से अपनी पहचान न जोड़ने की सीख दी गई. लेकिन अंत में जय ने एक बच्चे को सलाह दी बनना है तो नंबर वन नेवर बी नंबर टू। यही विरोधाभास चर्चा का अहम पहलू रहा.जीतने की पूरी कोशिश करना जरूरी है लेकिन अपनी खुशी और पहचान को केवल नतीजे से जोड़ना नहीं।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें