यमुनानगर। जिले के गांव हरनौल में स्थित पंचतीर्थी धाम पर कपालमोचन के ठीक तीन दिन बाद लगने वाले मेले में हर साल श्रद्धालु कम हो रहे हैं। एक दशक पहले तक 30 से 35 हजार तक श्रद्धालु मेले में पहुंचते थे, वहीं धीरे-धीरे यह संख्या घटकर सात से नौ हजार तक रह गई है। इसका कारण सरकारी स्तर पर इस स्थान व मेले का प्रचार-प्रसार न होना बताया जा रहा है।
ग्राम पंचायत हरनौल में पंचतीर्थी गांव है, जहां यह मेला तीन दिन लगता है। सबसे ज्यादा श्रद्धालु मेले के दूसरे दिन पंचमी पर आते हैं। मान्यता है कि पंचमी पर यहां के सरोवर में स्नान से चर्म रोग व पापों से मुक्ति के साथ अन्य सुख मिलते हैं। इस बार भी रविवार को पंचमी पर मेले में करीब पांच हजार श्रद्धालु पहुंचे। पहले व आखिरी दिन संख्या दो-दो हजार आंकी गई।
मेले के तीनों दिन यहां स्थित प्राचीन श्रीराम-कृष्ण मंदिर धाम व पंचमुखी हनुमान मंदिर के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं की कतार लगी रही। यहां प्रसाद चढ़ाकर श्रद्धालुओं ने मन्नतें मांगी। मंदिर के सामने लगे बेरी के पेड़ पर सुबह से शाम तक श्रद्धालुओं ने परांदा बांध मन्नतें मांगी। दोनों मंदिरों व बेरी के पेड़ के अलावा श्रद्धालुओं ने सामने बने सरोवर पर दीपदान व आचमन किया।
सोमवार को मेले के आखिरी दिन पुराना हमीदा से पहुंची परवीन व रजनी ने बताया कि वह कई वर्षों से पंचतीर्थी के मेले में आ रहे हैं। यहां बेरी के पेड़ पर परांदा बांधने से उनके परिवार में विवाह व संतान सुख जैसी मन्नतें पूरी हुई हैं। पंचतीर्थी धाम कमेटी के प्रधान सुरेंद्र सैनी ने बताया कि मेले में कमेटी की ओर से श्रद्धालुओं के लिए तीन दिन दोपहर से शाम तक भंडारा लगाया गया। साथ ही मेला स्थल पर पेयजल व सफाई के प्रबंध किए गए। संवाद
हरियाणवी सांग, वैरायटी-शो दस साल से बंद
श्रद्धालुओं की संख्या कम होने के साथ मेले से जुड़े किस्से व परंपराएं भी छूट रहे हैं। मेले का आकर्षण रहे हरियाणवी सांग, वैरायटी-शो व मौत का कुआं भी दस साल से बंद हैं। मेले में पहुंचे बुजुर्ग श्रद्धालुओं में सरोज, बिमला, कुलवंत, रजो देवी ने बताया कि 15 साल से यहां के इतिहास व मान्यताएं सुनकर मेले में आ रहे हैं। कपालमोचन आने वाले हरियाणा व पंजाब के विभिन्न जिलों से भी पंचतीर्थी मेले में श्रद्धालु आते थे, पर अब ऐसा नहीं है। इसके साथ सरकारी स्तर पर प्रचार न होने से भी गत दस वर्षों से मेले में श्रद्धालु कम हुए हैं।
ये हैं मान्यताएं
पंचतीर्थी धाम के महंत किशोरी शरण दास जी महाराज ने बताया कि अज्ञातवास के दौरान यहां द्रौपदी सहित पांडव ठहरे थे। यहां बना सरोवर पांडवों का बनाया हुआ है। सरोवर में पांडवों ने अस्त्र-शस्त्र धोये थे। द्रौपदी ने यहां स्थिर बेरी के पेड़ पर धागा मन्नत मांगी थी। बेरी को दुख भंजन कहा गया। मान्यता है कि बेरी पर परांदा बांध मांगी मन्नत पूरी होती है। इसलिए मेले में हजारों श्रद्धालु खासकर युवतियां व महिलाएं पेड़ पर तीनों दिन परांदा बांध विवाह व संतान सुख की मन्नते मांगती हैं। मन्नतें पूरी होने पर मेले में आकर परांदा खोल दिया जाता है। सरोवर में स्नान को लेकर मान्यता है कि पांच रविवार को स्नान करने से चर्म रोग दूर होता है।
बेरी के पेड़ के पास दीपदान करते श्रद्धालु। संवाद
बेरी के पेड़ के पास दीपदान करते श्रद्धालु। संवाद