लखनऊ। ऑनलाइन गेम के दुष्प्रभाव चिंताजनक हैं। केजीएमयू में इंटरनेट डिसऑर्डर क्लीनिक के डॉ. पवन गुप्ता का कहना है कि गेम की लत बच्चों और किशोरों का मानसिक संतुलन बिगाड़ रही है। अधिक गेम खेलने वाले व्यक्ति की मानसिक स्थिति में ठीक वैसे ही बदलाव होते हैं, जैसे शराब या किसी अन्य नशे के शिकार व्यक्ति में होते हैं। विभाग में आने वाले ऐसे मरीजों की फंक्शनल एमआरआई से उनके दिमाग के अलग-अलग हिस्सों की कार्यप्रणाली देखी गई है। इसमें इंटरनेट डिसऑर्डर के शिकार मरीजों में डोपामिन हार्मोन रिलीज करने वाले मस्तिष्क के क्षेत्र में बदलाव देखा गया। इस हार्मोन से व्यक्ति का मूड नियंत्रित होता है। इसके प्रभावित होने से एक ही चीज का फितूर चढ़ जाता है। यह बात नशे और इंटरनेट दोनों मामलों में लागू होती है। युवा हिंसा वाले ऑनलाइन गेम खेलकर संवेदनहीन हो रहे हैं। आवेश में उनसे हिंसक घटनाएं हो जाती हैं, जबकि वास्तव में वे ऐसा चाहते नहीं हैं।
शौक नहीं मानसिक रोग बन चुकी है ऑनलाइन गेम की लत
किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय की मनोरोग विशेषज्ञ प्रो. बंदना गुप्ता के मुताबिक ऑनलाइन गेम की लत शौक से ज्यादा मानसिक रोग बन चुकी है। इसे रोकने के लिए कड़ी पाबंदी लागू करनी होगी। सरकार के स्तर पर भी फैसले लेने होंगे। अगर वाहन चलाने के लिए 18 वर्ष आयु निर्धारित है तो मोबाइल फोन के उम्र तय क्यों नहीं हैं। अभिभावकों को सुनिश्चित करना चाहिए कि निर्धारित उम्र के बाद ही बच्चों को मोबाइल फोन दें।
मोबाइल की लत बचने के लिए करें
- अपने लिए स्क्रीन टाइम का नियम बनाएं और इसकी सीमा निर्धारित करें।
- 18 साल से पहले बच्चों को मोबाइल फोन न दें, बात करने के लिए अपना फोन इस्तेमाल करने दें।
- बच्चों के सामने खुद भी मोबाइल फोन का कम से कम इस्तेमाल करें।
- अगर आपको लगता है कि मोबाइल फोन की लत लग रही है तो फिर केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग में चलने वाली विशिष्ट ओपीडी में संपर्क करें।
- खेलकूद की गतिविधियों में हिस्सा लें, किताबें पढ़ने की आदत डालें या फिर संगीत सुनें।
- बच्चे की गतिविधि पर ध्यान दें, अगर मोबाइल का लती है तो फिर उसे मानसिक रोग विशेषज्ञ को दिखाएं।
डॉ. पवन एवं डॉ. बंदना।