अमर उजाला काव्य की ओर से शनिवार को वैलेंटाइन डे स्पेशल डिजिटल काव्य कैफे का आयोजन किया गया। इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से कवियों ने शिरकत की और प्रेम के तरानों से लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया।
इस खास आयोजन में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से गजेंद्र प्रियांशु, अमेठी से प्रदीप तिवारी, बिहार से सूरज ठाकुर, गोरखपुर से आकृति विज्ञा अर्पण, आगरा से कुशल दौनेरिया, लखनऊ से अभिजीत मयंक और फर्रुखाबाद से आलोक यादव ने अपनी रचनाएं पेश कीं।
कार्यक्रम में बालाकोट हमले में शहीद वीर सपूतों को भी याद किया गया और दुनिय में प्रेम और शांति की कामना की गई। गजेंद्र प्रियांशु की रचना- हम हैं अनाड़ी और प्यार की कठिन राह, दुनिया के दांव-पेच हम नहीं जानते ने प्रेम के साथ-साथ अमन और शांति का भी पैगाम दिया।
आकृति विज्ञा अर्पण (गोरखपुर)
आकृति हिंदी में भोजपुरी कवित्री हैं। वह रेडियो और दूरदर्शन में भी कई बार काव्यपाठ कर चुकी हैं। कार्यक्रम की शुरुआत आकृति की कविता से हुई। उनकी रचना में लड़कियों के लिए एक संदेश भी था।
सुनो बसंती हील उतारो, अपने मन की कील उतारो,
नंगे पांव चलो धरती पर, बंजर पथ पर झील उतारो।
अभिजीत अयंक (लखनऊ)
गीतकार अभिजीत अनेकों कवि सम्मेलनों में और मुशायरों में शिरकत कर चुके हैं।
'वो मैंने सागर की हर लहर पर तुम्हारी तस्वीरें गढ़ रखी हैं
इसी बहाने से साहिलों पर तुम्हारा आना लगा रहेगा।'
वह जिससे पीड़ा ही ना मिले तो तुम ही बताओ वह घाव क्या है
हमारे सुर से तुम्हारी ले तक तुम ही बताओ जुड़ाव क्या है।
गजेंद्र प्रियांशु (बाराबंकी)
गजेंद्र ने हिंदी भाषी प्रदेशों में तथा विभिन्न समाचार चैनलों पर अनेक बार राष्ट्रीय एकता अखंडता को समर्पित काव्य पाठ तक मंच संचालन किया है कहीं काव्य कार्यक्रमों का हिस्सा बन चुके हैं कई सामानों से सम्मानित गजेंद्र प्रियांशु की रचना:
हम हैं अनाड़ी और प्यार की कठिन राह
दुनिया के दांव पेच हम नहीं जानते
दिन को कहो जो रात लगती है दिन
रात को कहो जो दिन हम मानते
मेरे प्यार को भले कहो कि एक नाटक है
किंतु तेरा नाटक भी हम प्यार मानते।
आलोक यादव (फर्रुखाबाद)
आलोक क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त पद पर कार्यरत हैं और गीत लेखन उनका शौक है। वह कई मंच पर काव्य-पाठ कर चुके हैं। कार्यक्रम में उनकी चंद लाइनें:
सुबह तेरी मुस्कान सी लगती है
तू मुझको तो आजा जान सी लगती है
एक तेरी नाराजगी के कारण यह दुनिया वीरान सी लगती है
तकता भी रहता है चांद उसे कुछ उससे पहचान सी लगती है
तुझको कहीं से पढ़ लूं मैं
तू गालिब का दीवान सी लगती है जिस दम मेरे साथ तू होता है
हर मुश्किल आसान सी लगती है।
कुशल दौनेरिया (आगरा)
कुशल दिल्ली से पढ़ाई कर रहे हैं। इन्हें बचपन से ही कविताएं, गजल और शायरी का शौक रहा है। काव्य कैफे में उन्होंने पेश किया:
तेरे बाद भी जिंदा हूं मैं मरा तो नहीं
हसीन हूं तेरी तू मेरी जां मगर खुदा तो नहीं
कि लाल रंग बड़ा खिल रहा था तुझ पर कल
तू रात आग लगाते हुए जला तो नहीं।
प्रदीप तिवारी (अमेठी)
प्रदीप श्रृंगार के कवि हैं और तरन्नुम में गीत प्रस्तुत करते हैं। वह कई कवि सम्मेलन का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने पढ़ा:
खेला दिल का दुआ है कई मर्तबा
इश्क मुझको हुआ है कई मर्तबा
ये मेरी उंगलियां जो जली दिख रही
मैंने उसको छुआ है कई मर्तबा।
सूरज ठाकुर (बिहार)
सुपौल जिले से शामिल हुए सूरज शास्त्रीय संगीत की पढ़ाई कर रहे हैं। उनका लेखन मुक्तक, गीत और गजल है। लेखन के साथ-साथ संगीत का भी ज्ञान रखने वाले सूरज ने सुनाया:
प्रेम खामोश एक कहानी है
प्रेम से रूह की जवानी है
प्रेम है तो जहां में खुशबू
प्रेम इक रोग खानदानी है।
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