इंदिरा नगर सेक्टर 8 स्थित अलग दुनिया स्टूडियो में हिंदी स्वमंच की अंतरराष्ट्रीय स्तर की रंगकर्म
लखनऊ। राजधानी की वरिष्ठ रंगकर्मी मृदुला भारद्वाज को थिएटर और हिंदी रंगमंच में इस साल पांच दशक पूरे हो गए। रविवार को अयोध्या रोड पर एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि मेरी अंतिम इच्छा है कि मंच पर अभिनय करते हुए मेरे प्राण छूटें। मेरा पूरा जीवन हिंदी रंगमंच को समर्पित रहा है।
अपने रंगमंच की यात्रा की कहानी साझा करते हुए उन्होंने बताया कि सत्तर और अस्सी के दशक में लखनऊ जैसे शहर में महिलाओं के लिए रंगमंच पर काम करना आसान नहीं था। थिएटर में काम करने के लिए उन्हें अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ चोरी-चुपके काम करना पड़ा। कार्यक्रम में वरिष्ठ रंगकर्मी भारतेंदु कश्यप, प्रमिल द्विवेदी और केके वत्स ने उनसे बातचीत की।
मृदुला भारद्वाज ने अपनी रंगमंच की यात्रा 1977 से शुरू किया। उन्हें नौशाद सम्मान और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाजा जा चुका हैं। उन्होंने बताया कि 1991 में वे लखनऊ से पहली महिला रंगकर्मी थीं जो अपने ग्रुप को लेकर नाटक का मंचन करने विदेश गईं। कहा, नार्वे में 22 देशों की टीम में उनके नाटक को सर्वश्रेष्ठ चुना गया। इसके बाद फिनलैंड, जर्मनी, स्वीडन, डेनमार्क और कनाडा के साथ ही तीन बार पाकिस्तान में भी मंचन का सौभाग्य मिला। मेघदूत नाट्य संस्था में सचिव और इप्टा लखनऊ में उपाध्यक्ष रहीं मृदुला इस समय नीपा रंगमंडली की सचिव हैं। सौ से अधिक नाटकों का देश-विदेश में मंचन कर चुकीं मृदुला भारद्वाज आज भी पूरे उत्साह के साथ सक्रिय हैं।