मूकबधिर किशोर की 2020 में आरोपियों ने निर्मम तरीके से की थी हत्या, अदालत ने दोषियों पर एक लाख 15 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट)-2 विजय कुमार हिमांशु की अदालत ने 15 वर्षीय मूकबधिर किशोर से अप्राकृतिक संबंध बनाने और निर्मम हत्या के मामले में जेवर के साहिल व इरफान को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। दोषियों पर एक लाख 15 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माने की 80 प्रतिशत राशि वादी को देनी होगी। जुर्माना नहीं देने पर एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
18 मार्च 2020 को जेवर थाना क्षेत्र के एक गांव में 15 वर्षीय किशोर घर से लापता हो गया था। उसके पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। जांच में पता चला था कि किशोर को आरोपियों ने अपने साथ ले जाकर अप्राकृतिक संबंध बनाया और फिर ईंट से उसका सिर कुचलकर हत्या कर दी। शव को अलीगढ़ के टप्पल क्षेत्र में एक कॉलेज के पास खेत से बरामद किया गया था।
पुलिस ने मामले में केस दर्ज कर आरोपियों को गिरफ्तार किया था। अदालत में आरोपियों के वकील ने दलील दी थी कि मौत अनजाने में हुई और आरोपी व पीड़ित दोस्त थे। आरोप झूठे और गढ़े गए हैं। शिकायत में वर्णित पीड़ित की शारीरिक बनावट, कपड़े और चप्पल का विवरण बरामद शव से मेल नहीं खाता है। पंचायतनामा, एफएसएल रिपोर्ट और बरामद शव की शारीरिक बनावट में विसंगतियां हैं लेकिन अदालत ने इस दावे को खारिज कर दिया।
अदालत ने आरोपियों को आईपीसी की धारा-302 (हत्या) के आरोप में आजीवन कारावास के साथ 50 हजार रुपये जुर्माना लगाया। धारा-377 (सोडोमी) में आजीवन कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माना लगाया। पॉक्सो एक्ट की धारा 5/6 में आजीवन कारावास के साथ 50 हजार रुपये जुर्माना लगाया। धारा-201 (सबूत मिटाने) के आरोप में तीन साल कैद व पांच हजार रुपये का जुर्माना लगाया। वहीं, अदालत ने अपहरण (धारा-363) के आरोपों से बरी कर दिया।
मामला अत्यंत घिनौना, जघन्य अपराध : कोर्ट
अदालत ने सभी साक्ष्यों का गहन विश्लेषण करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित करने में सफल रहा है। सीडीआर और लास्ट सीन थ्योरी के आधार पर आरोपियों की उपस्थिति साबित हुई। सजा सुनाते हुए कहा कि आरोपियों ने एक निर्दोष और दिव्यांग किशोर के साथ अमानवीय जुल्म किया जो दुर्लभतम में दुर्लभ अपराध की श्रेणी में आता है। मामला अत्यंत घिनौना है जिसमें एक दिव्यांग किशोर के साथ शारीरिक शोषण के बाद उसकी क्रूर हत्या की गई। पीड़ित का चेहरा पहचान से परे विकृत कर दिया गया था। हत्या घबराहट में की गई प्रतीत होती है लेकिन चेहरे को विकृत करना निश्चित रूप से जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है। आरोपियों की कम उम्र को देखते हुए मृत्युदंड के बजाय आजीवन कारावास की सजा उचित समझी गई। पीड़ित के पिता ने अदालत के फैसले को न्याय की जीत कहा है।