-पुनचक्रीकरण कर बुने कपड़े में किया जाएगा तब्दील, पर्यावरणीय प्रभाव को किया जा सकेगा कम
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। आईआईटी दिल्ली के शोधकर्ताओं ने डेनिम कचरे(मोटा सूती कपड़ा) को रिसाइकिल कर बुने कपड़े में तब्दील करने की विधि विकसित की है। इस संबंध में जर्नल ऑफ क्लीनर प्रॉडक्शन में शोध प्रकाशित हुआ है। दावा है कि इस विधि को अपनाने से 30-40 फीसदी पर्यावरणीय प्रभावों को कम किया सकता है।
आईआईटी दिल्ली के टेक्सटाइल एवं फाइबर इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. अभिजीत मजूमदार और प्रो. बीएस बुटोला के नेतृत्व में शोध दल ने पाया कि 50 फीसदी तक रिसाइकिल धागों का उपयोग बुने हुए कपड़ों में बिना उत्पाद की बनावट को खराब किए कर सकते है। प्रो. मजमूदार ने बताया कि उपयोग के बाद फेंके गए कपड़े और परिधान का हर साल लगभग 39 लाख टन कचरा देश में जमा होता है। इसमें से मात्र चार फीसदी को रिसाइकिल किया जाता है। अधिकांश कपड़ों के अपशिष्ट लैंडफिल पर चले जाते हैं और वर्षों तक वहीं पड़े रहते हैं।अलग-अलग रंग और रेशे(फाइबर) के मिश्रण के चलते उपयोग वाला कपड़ा अपशिष्ट का रिसाइकिल करना चुनौतीपूर्ण है।
शोधकर्ताओं की टीम ने गुणवत्ता से समझौता किए बिना डेनिम के कचरे को बुने हुए कपड़ों में रिसाइकिल करने की एक विधि विकसित की है। इस प्रक्रिया में बेकार डेनिम के धागों को रिसाइकिल किया गया। इसके बाद रिसाइकिल धागों को सीमलेस होल गारमेंट तकनीक का उपयोग करके बुने हुए कपड़े में मिलाया। बुने हुए कपड़ों का उत्पादन 25 फीसदी से 75 फीसदी तक रिसाइकिल धागे की मात्रा के साथ किया। उन्होंने कहा कि इसे किसी भी अन्य कपड़ा अपशिष्ट पर लागू किया जा सकता है। इस शोध का एक अन्य प्रमुख पहलू भारतीय संदर्भ में जीवन चक्र मूल्यांकन (एलसीए) के माध्यम से पर्यावरणीय लाभों का परिमाणन करना था।
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30-40 फीसदी पर्यावरणीय प्रभाव कर सकते हैं कम
इस परियोजना पर कार्यरत पीएचडी स्कॉलर सत्या कर्माकर ने पानीपत टेक्सटाइल रिसाइक्लिंग क्लस्टर से ऊर्जा और सामग्री संबंधी आंकड़े एकत्र किए। आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चला कि इससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, अम्लीय वर्षा और जीवाश्म ईंधन के संदर्भ में लगभग 30-40 फीसदी पर्यावरणीय प्रभावों को कम किया जा सकता है। जबकि ओजोन परत के संदर्भ में यह लगभग 60 फीसदी है। उन्होंने बताया कि रिसाइकिल रेशों के उपयोग से कपास का उपयोग कम होगा। खेती में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों, उर्वरकों और पानी की बचत होगी। कपास की खेती का वैश्विक तापमान वृद्धि में 24 फीसदी का योगदान है।