नई दिल्ली। लॉकडाउन में अपने गांव में लौट चुके मजदूरों को मुआवजा देने से सरकार केवल इसलिए इंकार नहीं कर सकती क्योंकि बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर बोर्ड में पंजीकरण के लिए उनका वेरीफिकेशन नहीं हो सका। यह बात बृहस्पतिवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली सरकार से कही।
न्यायमूर्ति विपिन सांघी तथा न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की खंडपीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई करते हुए कहा कि ऐसे कई मजदूर कुछ समय तक वापस नहीं आएंगे तो उनका वेरीफिकेशन फोन पर या वीडियो कॉल के जरिये किया जा सकता है। इन मजूदरों का वेरीफिकेशन कंस्ट्रक्टशन साइट पर भी किया जा सकता है।
खंडपीठ ने बोर्ड की ओर से दिल्ली सरकार के स्थाई अधिवक्ता संजोय घोष तथा अधिवक्ता उर्वि मोहन की उस दलील को खारिज कर दिया कि मजदूरों का व्यक्तिगत रूप से वेरीफिकेशन केवल डीएमआरसी तथा एलएंडटी जैसी बड़ी कंपनियों की कंस्ट्रक्शन साइट पर ही किया जा सकता है।
खंडपीठ ने कहा कि व्यक्तिगत रूप से होने वाले पंजीकरण में वह मजदूर छूट जाएंगे जो अपने गांव लौट गए हैं और कुछ समय वापस नहीं आने वाले। अगर इन मजदूरों का व्यक्तिगत रूप से वेरीफिकेशन किया जाता है तो इन्हें दिल्ली लौटने तक मुआवजा नहीं मिल पाएगा। कोर्ट ने यह टिप्पणी सामाजिक कार्यकर्ता सुनील कुमार अलेडिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
याची ने निर्माण श्रमिकों का पंजीकरण बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर अधिनियम में करने की मांग की है ताकि उन मजदूरों को लॉकडाउन में प्रति माह सरकार से पांच हजार रुपये की मदद मिल सके। हाईकोर्ट ने कहा बोर्ड को इन मजदूरों के वेरीफिकेशन व पंजीकरण के नवीनीकरण के लिए सरल उपायों को अपनाने पर विचार करना चाहिए।
वहीं इस मामले में एक अन्य शख्स सुखबीर शर्मा ने अर्जी दायर कर मजदूर सेस के 3200 करोड़ के फंड की हेराफेरी का आरोप बोर्ड अधिकारियों तथा यूनियनों पर लगाया। खंडपीठ ने शर्मा को आरोपों के संबंध में हलफनामा दाखिल कर साक्ष्य पेश करने की अनुति दी है।