चाइल्ड पीजीआई में इलाज नहीं मिलने की वजह से मासूम की जान चली गई। दस माह की तड़पती मासूम को लेकर पिता इमरजेंसी में इलाज की मिन्नतें मांगते रहे, लेकिन स्टाफ लापरवाह बना रहा। डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ ने बीमार बच्ची को हाथ तक लगाने की जरूरत नहीं समझी। आखिरकार उल्टी से बेहाल मासूम ने दम तोड़ दिया। परिजनों ने इस मामले की शिकायत स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन से की है।
दिल्ली के न्यू अशोक नगर निवासी नीतिश कुमार नोएडा की गारमेंट कंपनी में मजदूरी करते हैं। उनकी दस माह की बेटी वेदिका को शुक्रवार शाम से उल्टियां हो रही थीं। शनिवार सुबह करीब 9 बजे सेक्टर-30 स्थित चाइल्ड पीजीआई की ओपीडी में पहुंचे। डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड सहित कुछ जांच कराकर पर्चे पर दवाएं लिखकर घर भेज दिया। डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट सामान्य बताई थी। तबीयत ज्यादा बिगड़ने पर शनिवार रात करीब एक बजे बच्ची को चाइल्ड पीजीआई की इमरजेंसी में लेकर पहुंचे, लेकिन स्टाफ ने डॉक्टर मौजूद नहीं होने की बात कहकर इंजेक्शन लगाकर लौटा दिया। उल्टी दर्द से तड़पती मासूम को गोद में लेकर नीतिश रविवार सुबह करीब 10 बजे फिर चाइल्ड पीजीआई पहुंचे।
आरोप है कि इमरजेंसी के बाहर पर्ची बना रहे कर्मचारी ने उन्हें अंदर प्रवेश नहीं दिया और डांटते हुए पर्ची पर 24वां नंबर लिखकर लाइन में लगने को कहा। इस दौरान बच्ची की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। नीतिश किसी तरह इमरजेंसी में पहुंच गए लेकिन डॉक्टर और अन्य स्टाफ ने बच्ची को हाथ तक नहीं लगाया। पिता का आरोप है कि डॉक्टर दूर से ही बच्ची को इधर से उधर पलटने के निर्देश देता रहा। ईसीजी मशीन तक उन्हें खुद लाकर लगानी पड़ी। बच्ची तड़पती रही और उसने पिता की गोद में ही दम तोड़ दिया।