-चाइल्ड पीजीआई में इंडियन मलेरिया रिसर्च सेंटर के साथ मिलकर किया जा रहा शोध
-शोध के दौरान मलेरिया पॉजिटिव बच्चों में क्लोरोक्वीन रेजिस्टेंट का जीन पता किया जा रहा
वान्या दीक्षित
नोएडा। मलेरिया पॉजिटिव गंभीर बच्चों की हालत पर दवा का प्रतिरोध जानने के लिए चाइल्ड पीजीआई में शोध किया जा रहा है। इसके तहत संस्थान में आने वाले मलेरिया पॉजिटिव बच्चों में टारगेटेड नेस्टेड पीसीआर किया जा रहा है। इसके तहत मरीजों में क्लोरोक्वीन रेजिस्टेंट जीन का पता लगाया रहा है। यदि मरीजों में यह जीन पाया जाता है तो मलेरिया की दवा क्लोरोक्वीन उनपर असर नहीं करेगी। इस शोध में आईसीएमआर के तहत चल रहा इंडियन मलेरिया रिसर्च सेंटर भी सहयोग कर रहा है।
सेक्टर-30 स्थित चाइल्ड पीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की हेड डॉ. सुमी नंदवानी ने बताया कि मलेरिया में क्लोरोक्वीन दवाई दी जाती है लेकिन अब अन्य दवाएं भी दी जाने लगी हैं। ऐसे में क्लोरोक्वीन दवाई के विरुद्ध रेजिस्टेंट आ गई है। इसलिए हम देख रहे हैं कि मलेरिया पॉजिटिव कितने मरीजों में क्लोरोक्वीन रेजिस्टेंट है और क्लोरोक्वीन रेजिस्टेंट का जीन कितने मरीजों में है। यदि क्लोरोक्वीन रेजिस्टेंट का जीन हुआ तो दवा बच्चों पर असर नहीं करेगी। ऐसे में नई दवा देनी पड़ेगी। इसके अलावा बच्चों में मल्टीप्लेक्स आरटीपीसीआर करके मिक्स इंफेक्शन का भी पता किया जा रहा है। इस शोध में विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कविता गुप्ता का भी सहयोग मिल रहा है।
रिपोर्ट में वाईवैक्स
लेकिन हालत हो रही गंभीर : डॉ. सुमी ने बताया कि प्लाज्मोडियम परजीवी की चार मुख्य प्रजातियां मलेरिया का कारण बनती हैं। प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम (सबसे खतरनाक), प्लाज्मोडियम वाईवैक्स (सबसे आम), प्लाज्मोडियम मलेरियाई और प्लाज्मोडियम ओवेल शामिल हैं। चाइल्ड पीजीआई में जिन बच्चों में मलेरिया की पुष्टि होती है, इनमें अधिकतर में प्लाज्मोडियम वाईवैक्स ही पाया जाता है। वाईवैक्स में मरीज की हालत गंभीर नहीं होती है। इसके बाद भी कुछ बच्चों की हालत गंभीर होने लगती है और मिक्स इंफेक्शन पाया जाता है।
डेढ़ साल के शोध में 6 महीने हो गए पूरे : डॉ. सुमी ने बताया कि इस शोध में 6 महीने से अधिक समय बीत चुका है। चाइल्ड पीजीआई में जो बच्चे मलेरिया पॉजीटिव पाए गए थे उन्हें शोध में शामिल किया गया है। इंडियन मलेरिया रिसर्च सेंटर को भी शोध के लिए बच्चों को लाने की तैयारी की जा रही है।