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Noida News: औद्योगिक दबाव कम करने का विकल्प नोएडा, 50 साल में बना मुकम्मल शहर

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दिल्ली का औद्योगिक दबाव कम करने का विकल्प नोएडा, 50 साल में बना मुकम्मल शहर
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नोएडा के 50 वर्ष सीरीज की पहली खबर।

-17 अप्रैल 1976 को रखी गई थी नोएडा की नींव, रेत-कीकर वाली मिट्टी पर लहलहाया औद्योगिक विकास और बदलती गई तस्वीर

-अब यूपी का शो विंडो, सिलिकॉन सिटी, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफेक्चरिंग हब समेत कई नामों से जाना जा रहा है नोएडा, आगे और भी संभावनाएं अपार

माई सिटी रिपोर्टर,

नोएडा। शहर 17 अप्रैल को 50 साल का हो रहा है। आज मुकम्मल शहर और शहरों के लिए उदाहरण बन चुके नोएडा की नींव 1976 में दिल्ली में बढ़ औद्योगिक विकास के दबाव को कम करने के लिए विकल्प के तौर पर रखी गई थी। नाम दिल्ली के ओखला से जोड़कर न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (नोएडा) दिया गया था। तब यह कल्पना थी कि दिल्ली के और यमुना के नजदीक इस खाली पड़ी जमीन पर औद्योगिक इकाइयां लगेंगी।
विकास तो बिल्कुल नहीं था। गांव थे, गलियारे थे, खेत और रेत उड़ाती पगदंडियां और कीकर के पेड़। लेकिन उस रेतीली मिट्टी में औद्योगिक व शहरी विकास के बीज फूटने को ही थे। फिर हुआ ये कि वो बीज फूटे, वक्त के साथ पौधे फिर पेड़ बने और फिर उन पेड़ों के बीज गिरे और यह क्रम जारी रहा। नतीजन आज रोजगार के मौके नोएडा में लहलहा रहे हैं।
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आपातकाल में पड़ी थी नोएडा की बुनियाद :
नोएडा की स्थापना उस दौर में हुई थी जब देश में आपातकाल था। यह कल्पना संजय गांधी की थी। बताया जाता है कि संजय गांधी लखनऊ से एक विशेष विमान में चले और उनके साथ तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नरायण दत्त तिवारी थे। संजय गांधी ने विमान की खिड़की से बाहर की तरफ यमुना किनारे दूर तक फैले हुए खेत देखे थे। यह विचार फाइलों से होते हुए विमान से देखी गई जमीन पर पहुंचा और न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी की ईंट रखी गई।
हरौला और नयाबांस गांव की जमीन सबसे पहले ली गई थी : आज का नोएडा यहां के गांवों के किसानों के खेतों पर चमचमा रहा है। 1976 में नोएडा की बुनियाद पड़ने के साथ चिल्ला रेगुलेटर के पास टीन शेड में प्राधिकरण का दफ्तर शुरू हुआ। फिर सबसे पहले हरौला और नयाबांस के किसानों की जमीन ली गई थी। उस वक्त 4 रुपये प्रति गज के हिसाब से मुआवजा दिया गया था। इसके बाद दूसरे गांव की जमीन ली गई। धीरे-धीरे 81 गांव तक नोएडा पहुंचा है और मौजूदा दरें 5324 रुपये वर्ग मीटर की हैं।
माटी की गवाही-इन्होंने देखा नोएडा का कल्पना से हकीकत तक का सफर

बरौला गांव था और 1000 के करीब आबादी थी। गांव के सारे घर भी पक्के नहीं थे। गांव के किनारों पर कीकर के पेड़ थे, कच्ची सड़कें और पगदंडियां थीं। हम छोटे थे लेकिन स्कूल जाने लगे थे। एक दिन घर की बैठकी में चर्चा सुनी कि नोएडा आ गया है। फिर धीरे-धीरे विकास आता हुआ दिखा। हमारे गांव में उस समय के विधायक रामचंद्र विकल ने एक अस्पताल और पशु चिकित्सालय बनवा दिया था। इसकी चर्चा आस-पड़ोस के कई गांव में थी। 1978 में हमारी जमीन नोएडा में गई, 4 रुपये गज मुआवजा मिला था। तब एक बार लगा कि शायद भविष्य सही नहीं होगा। लेकिन नोएडा के विकास ने यहां के गांव वासियों को खुशहाल जिंदगी दी है।

- सतवीर गुर्जर, बरौला, 62 वर्ष

नयाबांस में सिर्फ कुछ जगहों पर बांस थे और कीकर के पेड़ थे। आस-पड़ोस हमारे खेत थे, और उनके बीच में जंगल। सेक्टर-15 ए, 16 जहां पर है उसके आसपास मैं खेतों में परिवार के साथ कामकाज के लिए जाया करती थीं। 1976 में जब नोएडा आया तब हमारे गांव की सबसे पहले जमीन ली गई। खेत चले गए फिर लगा कि कैसे जिंदगी आगे बढ़ेगी। मुआवजा कब तक चलेगा। गाय-भैस चरने के लिए कहां जाएंगी। लेकिन फिर नोएडा बढ़ना शुरू हुआ तो आशंकाएं दूर होती चली गईं। खेतों से लेकर अब उन जगहों पर खड़ी चमचमाती इमारतों तक का बदलाव देखना सुखद रहा है। - मायावती, नयाबांस, 76 वर्ष


सड़कें नहीं थीं, न बिजली थी न गाड़ियां। तब नोएडा नहीं था हमारे गांव थे। बरौला से बच्चों को दूसरे गांव अकेले नहीं जाने दिया जाता था कारण आसपास जंगल था। सेक्टर-49, 48 जहां पर हैं वहां गाय-भैंस चराने के लिए जाया जाता था। फिर नोएडा आया यह कहा गया कि ये नोएडा हरौला के आगे नहीं बढ़ पाएगा। लेकिन हमारे गांव में भी अधिकारी आए। जमीन दी जानी शुरू हुई। 1979 में पहली सड़क दादरी-सूरजपुर-छलेरा (डीएससी) रोड बनी। इसके बाद विकास और नोएडा के बढ़ने का सिलसिला जारी रहा। - मांगे राम शर्मा, बरौला, 67 वर्ष
पहले नोएडा सिर्फ दिल्ली के किनारे था। फिर धीरे-धीरे नोएडा यहां तक भी आ गया। आज गाड़ियों का शोर घर से निकलते ही सुनाई देता है और पड़ोस से मेट्रो चलेगी यह कहा जा रहा है। लेकिन तब हमारे गांव में सिर्फ एक बैलगाड़ी थी। मैं अपने मायके जब जाती थी तब पैदल ही जाना होता था। 1976 में नोएडा आने के बाद सेक्टर बनना शुरू हुए, खेत कम होते हुए चले गए। आबादी बढ़ी और ऊंची ऊंची बिल्डिंगें बनती गईं। - ज्ञानवती देवी, हाजीपुर, 70 वर्ष।
सेक्टर-6 और 7 की जो डिवाइडिंग रोड है वहां पर हमारे खेत थे। हमारे दादा के पास 65 बीघे जमीन थी। अधिकारी घर आए और नोएडा के बारे में बताया। फिर शाम को दादा जी ने यह बात पूरे घर को बताई। 1977 में मेरा जो पहला खेत लिया गया उसमें खड़ी फसल पर ट्रैक्टर प्राधिकरण ने रास्ता बनाने के लिए चलवाया। फिर सड़कें बनने लगी और पगदंडियां गायब होने लगीं। थोड़ा समझ बढ़ी तब यह जाना कि हमारे गांव के आसपास जहां पर कभी गाय-भैंसे चरती थीं वहां पर कंपनियां लग रही हैं।
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- हरीश चौधरी, हरौला, 60 वर्ष

आज तो गांव के चारों तरफ सेक्टर हैं वहां पर खेत थे। गांव से बाहर लोग खेतों पर काम करने, गाय-भैंस चराने या फिर कोंडली व गाजियाबाद बाजार के लिए जाने के निकलते थे। पहले हरौला, नयाबांस में नोएडा आने की चर्चा फैली थी। फिर 1978 में हमारे गांव में भी जमीन ली जानी शुरू हुई। हम छोटे थे लेकिन थोड़ा जानने-समझने लगे थे। पहले दादरी रोड फिर हमारे गांव के सामने सेक्टर-40 बना। हमारा गांव भी नोएडा हो गया और तरक्की बढ़ती चली गई। -
सुदेश कुमार, अगाहपुर, 61 वर्ष
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