अंबाला/ बराड़ा। साहा और बराड़ा क्षेत्र में धान की पराली जलाने के मामले इस बार एक भी नहीं हैं, ऐसा तब है जब पिछले वर्ष दोनों खंडों में 21 किसानों के खिलाफ पराली जलाने को लेकर एफआईआर दर्ज कराई गई थी। कृषि विभाग की सक्रियता और किसानों के मुहिम से जुड़ने के बाद इस बार पराली जलाने के स्थान पर किसान इसकी गांठें बनवा रहे हैं। कई गांवों की गांठों को एक जगह एकत्रित कर यमुनानगर के फैक्टरी संचालक ले जाते हैं। इन गांठाें का प्रयोग ईंधन और गत्ता बनाने के काम में लिया जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में किसानों को कुछ भी खर्च नहीं करना होता है। इस प्रक्रिया में कटाई व बुवाई के लिए जिन मशीनों का प्रयोग होता है उन्हें कृषि विभाग अपने स्तर पर मुहैया कराता है। यही कारण है कि इस बार बराड़ा और साहा में एक भी स्थान पर पराली जलाने की नौबत ही नहीं आई।
फैक्टरियों में काम आ रहे अवशेष
पराली की गांठें बनाकर यमुनानगर ले जा रहे अंबली निवासी रमन ने बताया कि फसली अवशेष प्रबंधन के तहत खेतों में धान कटने के बाद उनके फानों को ट्रैक्टर पर लगी मशीन के जरिये काटकर खेतों में फैला दिया जाता है, इसके बाद स्ट्रा बेलर के जरिये इस फसली अवशेष से गांठें बना दी जाती हैं। गांठें बनाने के बाद इन्हें ट्राली के माध्यम से किसी एक जगह स्टोरेज कर रहे हैं। आसपास के सभी गांवों से गांठें लाकर एक जगह पर रख रहे हैं। इसके बाद इन्हें यमुनानगर के भेड़थल में फैक्टरी में ले जाते हैं। इसके अलावा कई अन्य फैक्टरियों में इस अवशेष को ले जा रहा है। बराड़ा के किसान जयबीर थंबड़, परविन्द्र थंबड़, डॉ. दर्ब सिंह, राम सिंह सोहाता, संजू सेठी नाहरा, हरशरण सिंह नाहरा, कैलाश नंबरदार अधोया, बृज राणा टोबा, गुलाब सैनी महमूदपुर आदि ने बताया कि इस तरीके से उन्होंने पराली प्रबंधन का समाधान किया है। यह रास्ता विभागीय कार्रवाई से अच्छा है। वहीं फसल अवशेष न जलाकर सरकार की प्रोत्साहन योजनाओं का भी लाभ ले रहे हैं।
एक्स सी टू और इन सी टू प्रबंधन से हो रहा काम
जिला उपकृषि अधिकारी जसविन्द्र सिंह ने बताया कि एक्स सीटू प्रबंधन में स्ट्रा बेलर की माध्यम से गांठें बनाई जाती हैं। वहीं इन सीटू प्रबंधन में सुपरसीडर के माध्यम से सीधे अगली फसल की बिजाई की जा रही है। जिन खेतों में धान के फसली अवशेष थे, उनमें सुपरसीडर के माध्यम से ट्रैक्टर पर लगी मशीन आगे फसली अवशेष को मिट्टी में दबा देगी और पीछे-पीछे गेहूं, सरसों या अन्य फसलों के बीज की बुवाई कर देगी। इन्हीं दोनों प्रक्रियाओं को अपनाया जा रहा है। सरकार फसली अवशेष न जलाने पर किसान को प्रति एकड़ 1200 रुपये प्रोत्साहन राशि के रूप में दे रही है।
सरकारी विभागों ने ऐसे किया जागरूक
क्षेत्र के विभिन्न गांवों और स्थानों पर जाकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए, वहीं ऐसे गांवों पर ज्यादा ध्यान दिया गया जहां किसान संगठनों से जुड़े लोग हैं। किसानों को बारीकी से फसल के अवशेष जलाने के नुकसान बताए गए और प्रोत्साहन राशि के बारे में जानकारी दी। इसके सकारात्मक परिणाम आए।
-प्रवीण कुमार, खंड कृषि अधिकारी, साहा
गांव के सरपंचों की मीटिंग लेकर उन्होंने इस संबंध में विशेष आग्रह किया गया, वहीं गांवों में किसानों द्वारा फसली अवशेष न जलाने को लेकर मुनादी भी करवाई गई।
-सुशील मंगला, बीडीपीओ, बराड़ा
विभाग की तरफ से किसानों को सब्सिडी पर हैप्पीसीडर मुहैया करवाए गए हैं। प्रत्येक गांव में किसान के पास हैप्पीसीडर मशीन है।
-डॉ रविकांत, खंड कृषि अधिकारी, बराड़ा
मशीन की मदद से पराली को काटते हुए। संवाद